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सुप्रीम कोर्ट ने 10 में से 7 साल की सजा काट चुके बलात्कार के आरोपी को बरी किया;कहा – उसे अनुमान और संदेह के आधार पर सजा दी गई [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
23 Aug 2018 5:54 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने 10 में से 7 साल की सजा काट चुके बलात्कार के आरोपी को बरी किया;कहा – उसे अनुमान और संदेह के आधार पर सजा दी गई [निर्णय पढ़ें]
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हमें लग रहा है कि इस मामले में इस बात की पूरी आशंका है कि आरोपी को मामले में झूठा फंसाया गया है ताकि आरोपी के परिवार से बदला लिया जा सके क्योंकि दोनों परिवारोंके बीच लम्बे समय से विवाद चला रहा है”

सुपिर्म कोर्ट ने मंगलवार को उस व्यक्ति को बरी किये जाने का आदेश दिया जिस पर अपनी चचेरी बहन के साथ बलात्कार का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे सिर्फ अनुमान और संदेह के आधार पर सजा दी है।

आरोपी निचली अदालत से मिली कुल 10 साल की सजा में से 7 साल की सजा काट चुका है। एक अन्य अभियुक्त उसका भाई इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने से पहले ही अपनी सजा पूरी कर चुका है।

जय सिंह और शाम सिंह पर अपने नाबालिग चचेरी बहन के साथ बलात्कार का आरोप है। निचली अदालत ने शुरू में आरोपी को बरी कर दिया था पर जब हाईकोट ने इस मामले की सुनवाई की तो उसने आरोपी को दोषी पाया। हाईकोर्ट ने उसकी सजा को सही बताया।  शाम सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की जबकि जय सिंह अपनी सजा पूरी कर चुका है।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूति एनवी रमना और न्यायमूर्ति मोहन एम शंतानागौदर की पीठ ने कहा, “यह पूरी तरह स्पष्ट है कि अभियोजन ने जो मामला बनाया है वह वह कृत्रिम और मनगढ़ंत लगता है।”

अपनी बहन, बच्चे, पत्नी और माँ के बीच में अपने ही घर में बलात्कार करना संभव नहीं है। अगर यह घटना वास्तव में हुई होती, तो मेडिकल रिपोर्ट आरोपी के खिलाफ गया होता,” पीठ ने कहा।

हाईकोर्ट ने ‘माफीनामा’ पर यह निष्कर्ष निकालने के लिए भरोसा किया था कि आरोपी ने खुद ही बलात्कार करने की बात मान ली है। पीठ ने कहा कि बचाव पक्ष के गवाह पंचायतदार हैं उन्होंने कहा कि इस घटना के बारे में कोई पंचायत नहीं कराई गई और जो पंचायत हुई वह पीड़ित को प्रथम आरोपी द्वारा थप्पड़ मारने के आरोप को लेकर हुई। कोर्ट ने कहा कि अदालत में पूछताछ के दौरान उनसे कोई पूछताछ नहीं की गई।

पीठ ने यह भी कहा कि पीड़ित ने अपने बयान में कहीं भी यह नहीं कहा है कि बलात्कार को लेकर पंचायत में कोई बैठक हुई और आरोपी ने बलात्कार करने की बात स्वीकार की है। उसने बलात्कार किये जाने और पंचायत होने की बात सात महीने बात तब बताई जब उसे दुबारा बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया गया।

पंचायत के बारे में इस तरह की महत्त्वपूर्ण सूचना देने से पीड़ित चूक नहीं सकती थी अगर यह पंचायत वास्तव में हुई होती और इसमें बलात्कार के मामले की जांच की बात उठी होती। जैसा कि इस मामले के बारे में बताया जा चुका है, आरोपी की पत्नी, उसके बच्चे, उसकी बहन और माँ उस समय घर में मौजूद थे जब यह घटना हुई। हमें ऐसा लगता है कि इस तरह की परिस्थिति (बलात्कार) का होना काफी मुश्किल है,” पीठ ने कहा।

पीठ ने कहा कि तीन महत्त्वपूर्ण गवाहों जैसे वह दूध देने वाला जिसने सर्वप्रथम पीड़ित को अचेत पड़ा देखा, इस घटना के बाद सुई देने वाला वह डॉक्टर और पप्पू जिसके घर के सामने पीड़ित अचेत पड़ी थी, से पूछताछ नहीं करना इस मामले में अभियोजन को और कमजोर बना देता है। कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में परिवार के खिलाफ बदला लेने के लिए आरोपी को फंसाने की पूरी आशंका हो सकती है क्योंकि दोनों परिवारों के बीच काफी दिनों से विवाद चला आ रहा है।

पीठ ने इन बातों पर गौर करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।


 
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