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‘राहत में बदलाव’ के सिद्धांत की मदद उस समय नहीं ली जा सकती जब मामला मध्यस्थता की स्थिति में है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
22 Aug 2018 7:29 AM GMT
‘राहत में बदलाव’ के सिद्धांत की मदद उस समय नहीं ली जा सकती जब मामला मध्यस्थता की स्थिति में है : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राहत में संशोधन के सिद्धांत की मदद उस समय ली जा सकती है जब मुख्य मामले के तहत अंतिम रूप से राहत के बारे में निर्णय लिया जा रहा है पर मध्यस्थता के दौरान ऐसा नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने समीर नारायण भोजवानी बनाम अरोरा प्रॉपर्टीज एंड इन्वेस्टमेंट्स मामले में कहा कि जब मामले में मध्यस्थता चल रही हो तो आवश्यक आदेश सिर्फ वैसी यथास्थिति बनाए रखने के लिए दिया जा सकता जैसा उस समय था जिस समय यह मामला दायर किया गया था।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट के एकल जज ने मध्यस्थता के स्तर पर इस मामले में प्रतिवादी  को निर्देश दिया था कि वह आठ फ्लैट्स की चाबी और उसका पजेशन वादी को सौंप दे। उसे 16 पार्किंग की जगह भी सौंपने को कहा गया। कोर्ट ने कहा कि मूल रूप से वादी के कहने पर मामले की बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप उसने राहत को पहले ही परिवर्तित कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा मुकदमे के फैसले में लगने वाले समय को कम करने के लिए किया गया है।  खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराया था।

हाईकोर्ट ने गैव दिनशाव ईरानी एवं अन्य बनाम तेह्मतन ईरानी एवं अन्य मामले में आए फैसले पर भरोसा किया जिसमें कहा गया था कि कोर्ट को बदली हुई परिस्थिति में राहत में बदलाव करनी चाहिए ताकि मुकदमादारों को पूर्ण न्याय दिलाई जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैव दिनशाव ईरानी मामले में कोर्ट ने राहत में बदलाव मध्यस्थता के स्तर पर नहीं किया था और इसलिए यह गलत था।

इस मामले में फैसला लिखनेवाले न्यायमूर्ति खानविलकर ने कहा, “एकल जज और खंडपीठ दोनों ने मध्यस्थता के स्तर पर राहत में बदलाव नहीं करके मौलिक गलती की है।।।अपीलकर्ता के खिलाफ जो आदेश दिया गया है वह अनिवार्य और मध्यस्थता के स्तर पर दिया गया है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।  पर राहत में बदलाव करने और मध्यस्थता के दौरान अनिवार्य राहत देने में स्पष्ट अंतर है। मध्यस्थता के दौरान अनिवार्य राहत तभी दिया जा सकता जब वैसी यथास्थिति बहाल करनी हो जैसी मुकदमा दायर करने के समय थी।”

इसके बाद पीठ ने आदेश को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट गलती की और वह अपने अधिकारक्षेत्र के बाहर गया।


 
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