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पंचाट के फैसले को खारिज करने के लिए आवेदन में मौखिक साक्ष्य की इजाजत अगर बेहद जरूरी नहीं है तो नहीं देना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
21 Aug 2018 5:29 AM GMT
पंचाट के फैसले को खारिज करने के लिए आवेदन में मौखिक साक्ष्य की इजाजत अगर बेहद जरूरी नहीं है तो नहीं देना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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हालांकि, इस तरह के रिकॉर्ड में अगर ये बातें शामिल नहीं हैं और अगर वे धारा 34(2)(a) के तहत पैदा होने वाले मामलों के लिए प्रासंगिक हैं, तो हलफनामे के माध्यम से दोनों पक्षों को इसे कोर्ट की जानकारी में लाना चाहिए”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी पंचाट के निर्णय को बदलवाने के लिए दिए गए आवेदन में पंचाट के पास उपलब्ध रिकॉर्ड के अलावा और किसी रिकॉर्ड की सामान्यतः जरूरत नहीं है।

“हालांकि अगर इस तरह के रिकॉर्ड में कुछ जानकारी नहीं है पर अगर ये धारा 34(2)(a) के तहत पैदा होने वाले मामलों के लिए प्रासंगिक हैं तो इन्हें सभी पक्षों को हलफनामे के माध्यम से कोर्ट की जानकारी में लानी चाहिए। हलफनामे के समर्थन में लोगों से किसी भी तरह की पूछताछ की अनुमति नहीं होनी चाहिए बशर्ते कि ऐसा करना बेहद जरूरी न हो, क्योंकि सच पक्षकारों द्वारा दायर किये गए हलफनामे को पढने से जाहिर होगा,” यह कहना था एमकेय ग्लोबल फाइनेंसियल सर्विसेज लिमिटेड बनाम गिरिधर सोंधी मामले में  न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ का।

पृष्ठभूमि

एक स्टॉक एक्सचेंज के दलाल और उसके ग्राहक के बीच हुए मध्यस्थता के समझौते में एक विशेष क्षेत्राधिकार का क्लॉज़ था जो कि मुंबई के ही कोर्ट के अधीन था। मध्यस्थता की गई और ग्राहक के दावे को खारिज कर दिया गया। धारा 34 के तहत जो आवेदन दिल्ली के जिला अदालत में दाखिल किया गया था उसे क्षेत्राधिकार का मामला बताकर अस्वीकार कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने अपील को जिला जज के पास भेज दिया ताकि वह मामले का निर्धारण कर सकें और फिर उसके बाद साक्ष्य के आधार पर इसका निर्णय करें।

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दलाल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

क्षेत्राधिकार के मामले पर पीठ ने इंडस मोबाइल डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम डाटाविंड इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य के फैसले को उद्धृत करते हुए कहा, “यह स्पष्ट है कि...सिर्फ मुंबई की अदालत को ही इस मामले में सुनवाई का अधिकार है...दिल्ली में मध्यस्थता की सुनवाई की गई सुविधा के लिए जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने तय किया था और यह उप-नियमों को पढने से स्पष्ट है...”

रिमांड के बारे में पीठ ने संदीप कुमार बनाम डॉ। अशोक हंस के मामले में आए फैसले को उद्धृत करते हुए कहा कि धारा 34 के तहत पक्षकारों के लिए साक्ष्य पेश करने की जरूरत नहीं है। पीठ ने एक अन्य मामले (फिजा डेवलपर्स एंड इंटर-ट्रेड प्राइवेट लिमिटेड बनाम एएमसीआई (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य) में कहा गया है कि धारा 34 के तहत दिए गए आवेदन में मौखिक साक्ष्य की जरूरत नहीं है...”

पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया।


 
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