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भारतीय परिस्थितियों में कोई माँ अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न के बारे में झूठा मामला दायर नहीं कर सकती : बॉम्बे हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
10 Aug 2018 11:30 AM GMT
भारतीय परिस्थितियों में कोई माँ अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न के बारे में झूठा मामला दायर नहीं कर सकती : बॉम्बे हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भारतीय परिस्थितियों में कोई माँ अपनी बेटी के यौन उत्पीडन के बारे में कोई झूठा मुकदमा नहीं दायर कर सकती है। कोर्ट ने पुणे की एक 10 वर्षीय लड़की के यौन उत्पीडन के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराए जाने को सही माना।

 न्यायमूर्ति एएम बदर ने राजेंद्र भीम असुदेओ नामक एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। इस व्यक्ति ने यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा संबंधी अधिनियम, 2012 (पोक्सो अधिनियम) की धारा 6 और आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी ठहराए जाने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।

 असुदेओ ने अब कहा है कि उसे इस मामले में फंसाया गया है और उसने गवाहों के बयानों में कुछ अनियमितता की ओर इशारा भी किया।

 कोर्ट ने हालांकि कहा कि इस लड़की की माँ और अभियुक्त के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी और इस स्थिति में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि लड़की की माँ ने कोई झूठा मुकदमा दायर किया होगा। न्यायमूर्ति बदर ने कहा, “...यह घटना उसकी अल्पवयस्क बेटी की शादी की संभावना को प्रभावित करने वाली और उसके परिवार की इज्जत को मिट्टी में मिलाने वाली है। इसलिए याचिकाकर्ता की इस दलील को नहीं माना जा सकता कि उसे इसम मामले में उसे झूठे तरीके से फंसाया गया है।”

 कोर्ट ने याचिककर्ता की इस दलील को भी निरस्त कर दिया कि लड़की की माँ का बयान अविश्वसनीय है। कोर्ट ने कहा,“निस्संदेह, पीडब्ल्यू 2 सविता ने इस घटना के बारे में सिलसिलेवार तरीके से नहीं बताया है पर यह गौर करने वाली बात है कि वह ग्रामीण परिवेश से आती है और निरक्षर है तथा नौकरानी के रूप में काम करके अपनी आजीविका चलाती है। घटना के तीन-चार महीने के बाद हो सकता है कि वह इस घटना के बारे में सिलसिलेबार ढंग से नहीं बता पा रही है क्योंकि वह बौद्धिक रूप से इतना समर्थ नहीं है। पर यह अभियोजन पक्ष पर संदेह का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।”

कोर्ट ने इसके अलावा कहा, कि इसके बावजूद कि लड़की के पिता से कोई पूछताछ नहीं की गई, इससे इस मामले में दिए गए फैसले पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अभियोजन पक्ष ने उसका दोष निर्धारित कर दिया है जो किसी संदेह के परे है।

 इस तरह कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया और अभियुक्त को मिली 10 साल के सश्रम कारावास की सजा को सही ठहराया।


 
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