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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा, कर छूट की अधिसूचना में अस्पष्टता से राजस्व को फ़ायदा होना चाहिए [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
31 July 2018 8:07 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा, कर छूट की अधिसूचना में अस्पष्टता से राजस्व को फ़ायदा होना चाहिए [निर्णय पढ़ें]
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हम यहाँ दृढ़ता से यह कहना चाहते हैं कि अगर कराधान क़ानून में कोई अस्पष्टता है तो इसका लाभ करदाता को होना चाहिए। पर ऐसी स्थिति में जब कर में छूट की व्याख्या की जानी हो, संदेह का लाभ राजस्व हित को मिलना चाहिए’

सीमा शुल्क आयुक्त (आयात), मुंबई बनाम दिलीप कुमार और कंपनी मामले में एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि कर छूट की अधिसूचनाओं को बहुत ही कड़ाई से व्याख्या की जानी चाहिए और इसकी प्रयोज्यता साबित करने का दायित्व करदाता की होनी चाहिए और उसे यह साबित करना चाहिए कि उसका मामला कर छूट के मानदंडों के दायरे में आता है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एनवी रमना, न्यायमूर्ति आर बनुमती, न्यायमूर्ति मोहन एम शंतानागौदर और न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा कि अगर कर छूट की अधिसूचना में अस्पष्टता है, और जिसकी बहुत ही कड़ाई से व्याख्या की जानी चाहिए, तो इस अस्पष्टता से होने वाले लाभ का दावा करदाता नहीं कर सकता और इसकी व्याख्या अवश्य ही राजस्व के हित में होना चाहिए।

न्यायमूर्ति एनवी रमना द्वारा लिखे गए इस फैसले से सन एक्सपोर्ट कारपोरेशन, बॉम्बे बनाम उत्पाद शुल्क कलेक्टर मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले को पलट दिया गया है। संविधान पीठ के फैसले में कहा गया है कि पहले दिए गए फैसले से भ्रम उत्पन्न हो गया था और क़ानूनी रूप से असंतोषप्रद स्थिति पैदा हो गई थी।

सन एक्सपोर्ट का मामला

इस मामले की सुनवाई के बाद अपने फैसले में तीन जजों की पीठ ने कहा था कि कर छूट प्रावधानों या अधिसूचना में अस्पष्टता की व्याख्या इस तरह से होनी चाहिए कि वह अवश्य ही करदाता को लाभ पहुंचाने वाला हो जो कि इस तरह के लाभ का दावा कर रहा है।

फैसला

कोर्ट ने कहा, “इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सन एक्सपोर्ट मामले में फैसले के अनुपात, कि अगर छूट की अधिसूचना के बारे में व्याख्या पर दो राय हैं तो कराधान के मामले में अगर एक विचार भी करदाता के पक्ष में है तो उसे ही स्वीकार किया जाएगा। इस सिद्धांत ने भ्रम पैदा किया और क़ानून की असंतोषप्रद  स्थिति को जन्म दिया। इस अदालत द्वारा कई मामलों में भिन्न रुख अपना गया कि छूट की अधिसूचना को बहुत ही कठोरता से व्याख्या की जानी चाहिए, और कोई व्यक्ति जो छूट का दावा कर रहा है, अधिसूचना की व्याख्या के हिसाब से इसके अधीन नहीं आता है, तो वह छूट का दावा नहीं कर सकता।”


 
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