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शादी पंजीकरण की प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष देश में बदले हुए समय की मिजाज को प्रतिबिंबित करना चाहिए और इसे अंतर-धार्मिक शादियों को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए : पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
27 July 2018 5:59 AM GMT
शादी पंजीकरण की प्रक्रिया को धर्मनिरपेक्ष देश में बदले हुए समय की मिजाज को प्रतिबिंबित करना चाहिए और इसे अंतर-धार्मिक शादियों को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए : पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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याचिकाकर्ताओं के बीच निस्संदेह रिलेशनशिप है और वे शादी करना चाहते हैं। वे भिन्न धर्म के हो सकते हैं पर प्यार और स्नेह किसी बाधा को कब मानता है

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा राज्य को सुझाव दिया है कि वह अदालती शादी चेक लिस्ट (सीएमसीएल) को सरल और उसे विशेष विवाह अधिनियम के अनुरूप बनाएं ताकि उसमें न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप हो। कोर्ट ने कहा कि इनके कुछ प्रावधान निजता के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और ये अपमानजनक होने के साथ साथ विशेष विवाह अधिनियम के बाहर भी अत्यधिक रूप से सरकारी कार्रवाई पर निर्भर है।

न्यायमूर्ति राजिव नारायण रैना ने अलग अलग धर्म वाले याचिकाकर्ताओं की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसके बावजूद कि वे अलग-अलग धर्म के हैं, वे शादी करना चाहते हैं। इन लोगों ने माँ-बाप और प्रस्तावित शादी के बारे में किसी राष्ट्रीय अखबार में प्रकाशन के बारे में प्रस्तुत किये जाने वाले चेक लिस्ट में शादी के पंजीकरण की प्रक्रिया के कार्यवाही को नहीं अपनाने का आग्रह किया था क्योंकि इसका अख़बार में प्रकाशन उनके निजता के अधिकार पर अतिक्रमण है। लड़की ने कहा कि उसका परिवार इस शादी के एकदम खिलाफ है और उसको विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

कोर्ट ने इन दोनों के बारे में कहा, “याचिकाकर्ता निश्चित रूप से रिलेशनशिप में हैं और वे शादी करना चाहते हैं...और शादी विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के तहत होगी क्योंकि इनमें से एक हिंदू और दूसरा मुसलमान है। याचिकाकर्ता नंबर एक का कहना है कि वह याचिकाकर्ता नंबर दो का धर्म नहीं स्वीकार करना चाहती है और यह उसकी निजी पसंद है। ये दोनों ही बालिग़ हैं और उनके लिए क्या सही है इसके बारे में वाकिफ हैं...वे दोनों शिक्षित हैं और निजी कंपनियों में कॉस्ट अकाउंटेंट की नौकरी करते हैं।”

पीठ ने विशेषकर सीएमसीएल, गुरुग्राम की स्थितियों का जिक्र किया और कहा कि इनको नजरअंदाज किया जा सकता है क्योंकि ये निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं जिसे अब मौलिक अधिकार घोषित किया जा चुका है :




  • उपयुक्त टिकट लगे चार लिफ़ाफ़े आवेदनकर्ताओं और विवाह अधिकारी को उस जिला में भेजा जाता है जिस जिला के आवेदनकर्ता मूल निवासी हैं।

  • आवेदनकर्ता दुल्हा/दुल्हन आवेदन करने के समय एक ही स्थान पर एक ही छत के नीचे नहीं रह रहे हों।

  • राष्ट्रीय अखबारों में इनका प्रकाशन


इस मामले में अपनी दलील पेश करने वाले वकील ने कहा कि ये शर्तें काफी अपमानजनक, मनमाना, असंवेदनशील और आदिम है और तेजी से बदल रही सामाजिक स्थितियों और प्रस्तावित अंतर-धार्मिक शादी के अनुरूप नहीं है।

पीठ ने इस पर कहा कि शब्द ‘स्थाई’ का मतलब अस्थाई निवास भी हो सकता है अगर आवेदन देने के पहले वे उस पते पर 30 दिनों तक रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के माँ-बाप को अग्रिम सूचना देने की जरूरत नहीं है क्योंकि निजता, जीवन तथा स्वतंत्रता के अधिकारों को देखते हुए इनकी जरूरत नहीं है।

पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता विवाह अधिकारी के पास आवेदन दे सकते हैं...जो इस पर इस आदेश के आलोक में गौर करेगा। अपने कार्यालय में नोटिस बोर्ड पर इस संबंध में नोटिस लगाने के 30 दिन बाद वह शादी के पंजीकरण की प्रकिया को पूरी कर सकता है और याचिकाकर्ताओं को शादी का प्रमाणपत्र जारी कर सकता है। किसी तरह की गंभीर आपत्ति की स्थिति में वह क़ानून के अनुरूप कदम उठा सकता है अगर ऐसा करते हुए वह याचिकाकर्ताओं की इच्छा और पसंद को ध्यान में रखेगा जो कि सर्वाधिक वरीयता वाला है।

इसके बाद कोर्ट ने कहा कि राज्य को शादी से मतलब नहीं है, बल्कि इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को पूरा करने से उसको मतलब है जो कि उसके सोच को परिलक्षित करता है जबकि एक धर्मनिरपेक्ष देश में इसे बदलते समय का आइना होना चाहिए जो अंतर-धार्मिक विवाहों को बढ़ावा दे न कि स्वतंत्र भारत में बनाए गए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के पवित्र पाँव के नीचे बारूद बिछाए और अधिकारी वर्ग इस पर नाक भौं सिकोड़ें। इस अधिनियम को उन मामलों के लिए बनाया गया था जो किसी अन्य क़ानून के तहत नहीं आते हैं।”


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