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दिल्ली हाईकोर्ट ने 34 साल पहले अनिवासी भारतीयों को दिल्ली में जमीन दिलाने से वंचित किये जाने के बदले मुआवजे को सही ठहराया [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
10 July 2018 11:51 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट ने 34 साल पहले अनिवासी भारतीयों को दिल्ली में जमीन दिलाने से वंचित किये जाने के बदले मुआवजे को सही ठहराया [निर्णय पढ़ें]
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को उन 26 अनिवासी भारतीयों को मुआवजा देने का आदेश दिया है जिनको अपने देश से जुड़ने के लिए दिल्ली में एक जमीन को खरीदने से रोक दिया गया था।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने सरकार को उन याचिकाकर्ताओं को 11.20 लाख रुपए मुआवजा देने को कहा है जिन्होंने 1978 में सरकार की एक योजना में आवेदन किया था जिसे पांच साल बाद जनहित में छोड़ दिया गया।

“…सरकार ने करार तोड़ा था जो उसने आवेदकों से किया था। याचिकाकर्ताओं ने यह सोचकर आवेदन किया था कि उन्हें अपने देश में, दिल्ली में जमीन मिलेगी पर उन्हें इससे वंचित कर दिया गया। इसलिए आवेदकों को जो नुकसान हुआ उसके लिए एवज में उन्हें मुआवजा पाने का हक है,” ऐसा कहना था न्यायमूर्ति सिंह का।

मामले के बारे में

भारत सरकार ने 6 फरवरी 1978 को अनिवासी भारतीयों को दिल्ली में जमीन दिलाने के लिए एक योजना की शुरुआत की ताकि वे उस पर अपना घर बना सकें। यह योजना भारत सरकार के कार्य एवं भवन निर्माण, एल एंड डीओ ने शुरू किया था।

सभी एनआरआई को जिनके पास कोई जमीन या घर नहीं था, वे इस योजना में शामिल हो सकते थे। यह जमीन बदरपुर -मेहरौली रोड पर थी।

इसमें यह प्रावधान किया गया था कि अगर आवेदकों की संख्या उपलब्ध प्लाट की संख्या से ज्यादा नहीं होती है तो सरकार भूमि का आवंटन करेगी पर अगर उपलब्ध प्लाट की संख्या से आवेदकों की संख्या अधिक हुई तो फिर आवंटन ड्रा से होगा।

 फरवरी 13, 1980 को सरकार ने एक अन्य पत्र जारी कर कहा कि आवंटन जून 1980 के बाद होगा लेकिन सितंबर 1981 में इस योजना को समाप्त कर दी गई।  कोर्ट ने गौर करते हुए कहा कि जमीन की कीमत बढ़ जाने के कारण इस योजना को जनहित में समाप्त कर दिया गया।

कुछ आवेदकों ने इसके खिलाफ कोर्ट में अपील की और आरके डेका बनाम भारत संघ के नाम से यह मामला चला। 1999 में कोर्ट ने सरकार के निर्णय को सही बताया।

कुल 355 में से 26 आवेदकों ने मुआवजे के लिए मामला दर्ज कराया जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

सरकार मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी, सरकारी नीति ढाल नहीं बन सकती

कोर्ट ने कहा, “जनहित में योजना को रद्द करना क़ानूनी रूप से वैध हो सकता है, पर अगर सरकार अगर इस करार में एक पक्षकार है और उसका पक्षकार होने का प्रस्ताव है, तो फिर निजी अवतार में उसे करार के क़ानून के तहत इसके लिए वह जिम्मेदार होगा। निर्णय को जनहित में बताकर वह इस निर्णय के क़ानूनी परिणामों से नहीं बच सकती है बशर्ते कि पूरी प्रक्रिया ही गैरकानूनी हो। जनहित का खयाल रखने के साथ साथ उसे सच्चाई के साथ काम भी करना है...जननीति की बात करके वह करार के एक पक्षकार के रूप में अपनी भूमिका से पल्ला नहीं झाड सकती।”

“...वर्तमान मामले में आवेदकों को हुए घाटे की भरपाई की जा सकती है, इसके बावजूद कि यह योजना जनहित में रद्द की गई,” न्यायमूर्ति सिंह ने कहा।

मौके का हाथ से जाना

“सभी आवेदकों ने अग्रिम राशि चुका दी थी, जो उनको और सरकार को इस करार से जोड़ता है। अग्रिम राशि, जसवंत राय बनाम अबनाश मामले में आए फैसले के अनुसार, वह राशि है जो संपत्ति का खरीदार एक करार के तहत विक्रेता को देता है जो उसे बिक्री के समझौते को मानने के लिए बाध्य करता है,” कोर्ट ने कहा।

कोर्ट ने कहा कि सरकार ने आवेदकों को 10 हजार रुपए लौटाने के अलावा लिए बहुत सारे विकल्प नहीं छोड़े जो इन लोगों ने जमा कराए थे।

“लेकिन इस रिफंड से उन घाटों की भरपाई नहीं होती जो उनको भारत में अपनी जमीन खरीदकर घर नहीं बनाने देने से हुई जैसा कि ये लोग एक उचित समय आने पर करने वाले थे। ऐसी स्थिति में आवेदकों के हाथ से जो मौक़ा निकल गया उसके लिए उन्हें मुआवजे दिलाए जाते हैं,” न्यायमूर्ति सिंह ने निचली अदालत द्वारा नुकसान के आकलन के लिए अपनाए गए रुख को सही बताया कि ऐसा करते हुए जिस समय इस करार को रद्द किया गया उस समय इस जमीन की बाजार में कीमत को ध्यान में रखा जाए।

“...कोर्ट ने कहा कि आवेदकों ने न केवल लगभग 34 साल तक मुकदमा लड़ा है, बल्कि उन्हें दिल्ली जैसे शहर में 400 वर्गफुट जमीन से भी वंचित होना पड़ा। इस स्थिति में उनको कम से कम मुआवजा तो दिया ही जाना चाहिए। उस समय जमीन की कीमत को ध्यान में रखते हुए 11,20,000 रुपए इस करार को 1983 में तोड़ने का मुआवजा उचित है,” न्यायमूर्ति सिंह ने कहा।

कोर्ट हालांकि, इस मामले में आपराधिक लापरवाही की निचली अदालत की दलील से सहमत नहीं हुआ।


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