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निर्भया केस में तीन दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की पुनर्विचार याचिका

LiveLaw News Network
9 July 2018 12:57 PM GMT
निर्भया केस में तीन दोषियों की फांसी की सज़ा बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की पुनर्विचार याचिका
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16 दिसंबर निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजायाफ्ता मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए उनकी फांसी की सजा बरकरार रखी है जबकि चौथे दोषी अक्षय ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं की है।

सोमवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने ये फैसला सुनाया और कहा कि याचिका में कोई आधार नहीं है कि फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। जस्टिस भूषण ने फैसला सुनाते हुए कहा कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है।

बेंच ने चार मई को इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

वहीं सुनवाई के दौरान दोषी मुकेश की ओर से पेश वकील मनोहर लाल शर्मा ने कहा कि उसे टार्चर  किया गया। टॉर्चर को लेकर ट्रायल  कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया गया लेकिन उस पर विचार नही किया गया।मामले की जांच भी सही ढंग से नही की गई। मुकेश घटनास्थल पर मौजूद नही था।

इस दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले की सुनवाई कोर्ट हिमालय की तरह धैर्यता से करता आया है।मुकेश को दोषी ठहराने के पीछे DNA  जांच, पीड़िता के मृत्युपूर्व बयान और बरामद सबूत ही आधार हैं। पीड़िता के शरीर पर मुकेश के दांतों के निशान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। वहीं दो दोषियों की ओर से पेश वकील एपी सिंह ने सुधार को आधार बनाते हुए सजा को उम्रकैज करने की गुहार लगाई थी।

सुनवाई में चीफ जस्टिस ने कहा था कि इस दलील को नहीं माना जा सकता कि  CRPC 313 के तहत दर्ज बयान टार्चर के बाद दबाव में दिए गए। अगर ये किया गया तो  देश में कोई भी ट्रायल नही चल पाएगा।

वहीं दिल्ली पुलिस ने दोषी मुकेश समेत तीनों दोषियों की पुनर्विचार याचिका का विरोध किया था। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा था कि ये मामला पुनर्विचार का नहीं है। तिहाड़ जेल प्रशासन या ट्रायल कोर्ट को भी कभी टार्चर के बारे में जानकारी नहीं दी गई।दरअसल 5 मई 2017 को  चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए मुकेश, अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा और पवन की फांसी की सजा को बरकरार रखा था।इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और अपील के दौरान उठे कई मुद्दों पर विचार नहीं किया। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को नृशंस, बर्बरतापूर्ण और पैशाचिक वारदात करार देते हुए मानव सभ्यता के लिए सदमे की सुनामी बताया था।   अपने 430 पेज के फैसले में बेंच ने दोषियों को पैशविक प्रवृति वाला करार देते हुए कहा था कि ये अपराध किसी दूसरी दुनिया की कहानी लगता है जहां मानवता का घोर अपमान किया गया। गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2012 की रात को पांच लोगों ने एक नाबालिग के साथ मिलकर बस में 23 साल की फिजियोथैरेपिस्ट के साथ बलात्कार किया और उसके साथ उसके दोस्त की लोहे की रॉड ये पिटाई की। फिर दोनों को बस से धक्का दे दिया गया। पीडिता का नाम निर्भया रखा गया और दो हफ्ते बाद उसने दम तोड दिया। इस मामले में पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया जहां एक ने तिहाड जेल में खुदकुशी कर ली। नाबालिग को 31 अगस्त 2013 को तीन साल के लिए सुधारगृह भेजा गया और दिसंबर 2015 में उसे रिहा कर दिया गया।

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