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आरोपी की उँगलियों के निशान का नमूना प्राप्त करने के लिए जांच अधिकारी को मजिस्ट्रेट से आदेश लेने की जरूरत नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
3 July 2018 3:05 PM GMT
आरोपी की उँगलियों के निशान का नमूना प्राप्त करने के लिए जांच अधिकारी को मजिस्ट्रेट से आदेश लेने की जरूरत नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने सोनवीर@सोमवीर बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली मामले में कहा कि पुलिस अधिकारी को किसी आरोपी की उँगलियों के निशान का नमूना प्राप्त करने के लिए मजिस्ट्रेट से आदेश प्राप्त करने की जरूरत नहीं है। यह कहा गया कि कैदियों की पहचान अधिनियम की धारा 8 के तहत राज्य सरकार द्वारा कोई नियम नहीं बनाया जाना इसके तहत उपलब्ध अधिकारों के प्रयोग पर पाबंदी नहीं लगाता है।

 संदर्भ

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने कैदियों की पहचान अधिनियम की धारा 4 और 5 के महत्त्वपूर्ण प्रावधानों पर गौर किया। इस मामले में अभियुक्त ने आवेदन दाखिल किया है।

 न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने यह कहते हुए आरोपी को बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष याचिकाकर्ता का दोष साबित करने को लेकर परिस्थितियों को पूरी श्रृंखला को सामने रखने में विफल रहा है।

 अधिनियम की धारा 4 अभियुक्त नहीं है ऐसे व्यक्ति की माप लेने के बारे में है जबकि धारा 5 अभियुक्त की माप और उसका फोटो लेने के बारे में मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने के बारे में है।

 दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने हथेली के निशान को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह नमूना मजिस्ट्रेट के समक्ष नहीं लिया गया था। हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने कहा कि दिल्ली ने इस बारे में कोई नियम नहीं बनाया है और इसलिए कोर्ट सोनवीर उर्फ सोमवीर की हथेली के चिह्न को स्वीकार नहीं कर सकता।

 मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी नहीं

 कोर्ट ने कहा कि मोहम्मद अमन के मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस अधिकारी उँगलियों के निशान नहीं ले सकता। कोर्ट ने शंकरिया बनाम राजस्थान राज्य मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले को उद्धृत किया जिसमें कहा गया था कि पुलिस अधिकारी को उँगलियों का निशान प्राप्त करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति नहीं चाहिए।

 पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से किसी और कारण से असहमत होते हुए कहा, “इस धारा का उद्देश्य ऐसे मामलों में उँगलियों के निशान लेने का अधिकार देना नहीं है जिसमें सजा एक साल से भी कम हो सकता है लेकिन इस प्रावधान को इस तरह से नहीं पढ़ा जा सकता कि अगर किसी अपराध के लिए आजीवन कारावास या मौत की सजा हो सकती है तो भी उसको यह अधिकार नहीं है।”

 नियम नहीं बनाना अधिकारों का प्रयोग नहीं रोक सकता

 पीठ ने कहा, “धारा 8 के तहत राज्य सरकार द्वारा कोई नियम नहीं बनाना धारा 3 और 4 के तहत अधिकारों के प्रयोग से नहीं रोकता है...इस मामले में यह दलील की धारा 8 के तहत नियम नहीं बनाए जाने के कारण धारा 3 और 4 के तहत दिए गए अधिकारों का प्रयोग नहीं हो सकता, इसे मान लिया जाए तो धारा 3 और 4 के प्रावधानों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, और इस विधेयक को बनाए जाने का यह उद्देश्य कदापि नहीं रहा होगा।”


 
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