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किसी चीज को भूलना स्मृति का लोप होना नहीं है, न ही यह अल्जाइमर से ग्रस्त होना है – नहीं तो इस कोर्ट की बार और बेंच का बड़ा हिस्सा अल्जाइमर से ग्रस्त होता : न्यायमूर्ति जीएस पटेल

LiveLaw News Network
1 July 2018 9:37 AM GMT
किसी चीज को भूलना स्मृति का लोप होना नहीं है, न ही यह अल्जाइमर से ग्रस्त होना है – नहीं तो इस कोर्ट की बार और बेंच का बड़ा हिस्सा अल्जाइमर से ग्रस्त होता : न्यायमूर्ति जीएस पटेल
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अल्जाइमर ऐसा शब्द नहीं है जिसका इस तरह से प्रयोग किया जाए. यह रोग के लक्षण के साथ निदान की स्थिति है. स्मृति जाने की हर घटना अल्जाइमर होने का संकेत नहीं है. किसी चीज का भूलना स्मृति का लोप होना नहीं है,  ही यह अल्जाइमर हैअगर ऐसा होता तो इस कोर्ट की बार और बेंच का एक बड़ा हिस्सा अल्जाइमर से ग्रस्त होता,” यह कहना था बॉम्बे हाईकोर्ट के जज का. जज ने इस मामले की सुनवाई के दौरान एक अभियोगी को डांटते हुए यह बात कही जिसमें प्रतिवादी 78 और 80 साल के दो बुजुर्ग हैं. कोर्ट ने इस मामले को क़ानून का दुरूपयोग, झूठा और कपटपूर्ण बताया

 न्यायमूर्ति पटेल किरण बेल्लारा नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जो कि दोनों प्रतिवादियों के भाई की पत्नी हैं. बेल्लारा इन दोनों प्रतिवादियों के साथ मुलुंड में रहती हैं.

इस मामले के अन्य अभियोगी किरण बेल्लारा की बेटियाँ हैं जिनका आरोप यह है कि प्रतिवादी उनकी माँ को उस घर में नहीं आने देतीं और उन लोगों को अपनी माँ से मिलने नहीं देती हैं.

न्यायमूर्ति पटेल ने इस बात पर गौर किया कि प्रतिवादी नंबर दो अपनी बढ़ती उम्र और चलने में मुश्किल होने के बाद भी वे कोर्ट आई थी. उन्होंने कहा, “अभियोगी की इस कहानी में कि प्रतिवादी नंबर एक और दो किसी को मुलुंड के घर में आने से रोक रही हैं, कोई सच्चाई नहीं है ...उन्हें किसी भी तरह की हिंसा का दोषी भी नहीं माना जा सकता. दूसरी पंक्ति में अपनी कुर्सी से हमारी अदालत की प्रथम पंक्ति की कुर्सियों तक आने में, और यह मैं देख सकता हूँ, प्रतिवादी नंबर दो को दो से तीन फीट की दूरी तय करने में दूसरों की मदद लेनी पड़ी है.”

 प्रतिवादी नंबर दो ने कोर्ट को बताया कि किरण के गोद लिए हुए बेटे ने उसके भाई नारायण बेल्लारा (प्रतिवादी नंबर एक) को शारीरिक रूप से चोट पहुंचाया. नारायण बेल्लारा 78 साल के हैं और यह साबित करने के लिए फोटो भी पेश किया. उन्होंने कोर्ट को यह भी कहा कि परिवार के कई संपत्तियों को बांटा गया और मुलुंड की यह वर्तमान परिसंपत्ति उनके और उनके भाई के हिस्से में आई. लेकिन अभियोगी बहन-भाई अब उन लोगों की इस परिसंपत्ति को हड़पना चाहते हैं और इसलिए वे अपनी माँ का प्रयोग कर रही हैं. याचिका में कहा गया है कि नारायण और उनकी बहन भूलने की बीमारी और अल्जाइमर से ग्रस्त हैं. यह भी कहा गया कि इन लोगों ने एक वकील (प्रतिवादी नंबर तीन) के साथ मिलकर  अधिकृत रिकॉर्ड को बदलने का षड्यंत्र रचा है और उन्होंने फर्जी दस्तावेज तैयार किये हैं. पर कोर्ट ने इसे नहीं माना और कहा कि उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर वे इसे सही नहीं मानते.

कोर्ट ने कहा, “...यह शिकायत शुरू से अंत तक इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि किसी शिकायत का ड्राफ्ट इस तरह से तैयार नहीं किया जाता : इसमें टाइपिंग की गलतियां भरी पड़ी हैं...ऐसे दावे किये गए हैं जिनका कोई आधार नहीं है, इनमें अनसुलझे विरोधाभास और अन्य अशुद्धियाँ हैं.”

न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि अभियोगी दो और तीन (किरण बेल्लारा के बच्चों) का इस परिसंपत्ति पर कोई दावा नहीं है लेकिन इसके बावजूद वे इस मामले में पक्षकार बना दिए गए हैं.

कोर्ट ने कहा, “...अभियोगी नंबर दो और तीन इस घर में घुसने का बहाना ढूंढ रहे हैं ऐसा करके वे प्रतिवादी नंबर एक और दो को परेशान करना चाहते हैं ताकि जमुना की धार नामक घर में वे अपना पैर जमा सकें. अभियोगी खुद कहता है कि अभियोगी नंबर दो और तीन को दिन में 12 और 1 के बीच ही घर में आने की इजाजत दी जाती है और इसके बावजूद उनकी मांग है -

वर्तमान मामले में अंतिम फैसला आने तक कोर्ट अभियोगी नंबर दो और तीन को अभियोगी नंबर एक के साथ कभी भी रहने की अनुमति दे और समय की किसी पाबंदी के बिना उसे जमुना की धार नामक घर की पंक्ति में प्रवेश की इजाजत दे.”

कोर्ट ने कहा कि अभियोगी नंबर दो और तीन को घर में किसी समय जाने की अनुमति देने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

यद्यपि इस मामले को वापस नहीं लिया गया कोर्ट ने किरण बेल्लारा की बेटियों से कहा कि अगर उनके स्वास्थय की स्थिति को देखते हुए यह जरूरी लगता है तो वे लोग उसको अपने साथ ले जा सकते हैं पर ऐसा करने से पहले उनको और प्रतिवादियों के वकील को इसकी सूचना देनी होगी.

 

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