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मजिस्ट्रेट को विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा सुनवाई वाले शिकायत मामले में 'सभी' गवाहों की जांच करने की आवश्यकता नहीं : तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
29 Jun 2018 5:57 AM GMT
मजिस्ट्रेट को विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा सुनवाई वाले शिकायत मामले में सभी गवाहों की जांच करने की आवश्यकता नहीं : तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
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मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा और गवाहों की जांच की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि  अगर न्याय की आवश्यकता है कि सीआरपीसी की धारा 311  के तहत प्रक्रिया का पालन करके कुछ और गवाहों की जांच की जानी है तो अदालत किसी अन्य गवाह की जांच कर सकती है लेकिन अदालत के गवाह के रूप में, शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में नहीं । 

 ' पिट्टा चंद्रममा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य’ में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने  कहा है कि एक शिकायत मामले में विशेष रूप से सत्र न्यायालय द्वारा ट्रायल चलाया जा सकता है, मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता को सभी सूची-निर्दिष्ट गवाहों की जांच करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन शिकायतकर्ता के लिए यह पर्याप्त है कि वो अपने सभी गवाहों को प्रस्तुत करे, जिसका मतलब उन गवाहों से है जिन पर शिकायतकर्ता का विश्वास है।

न्यायमूर्ति यू दुर्गा प्रसाद राव ने यह भी देखा कि मजिस्ट्रेट द्वारा जांच किए जाने वाले गवाहों को सीआरपीसी की धारा 311  के मामले में अदालत के गवाह के रूप में सत्र अदालत द्वारा कारण देकर जांच की जा सकती है, अगर उसके विचार में इस तरह की गवाही मामले का निर्णय देने में जरूरी है।

आरोपी ने अपनी याचिका में उच्च न्यायालय के समक्ष दलील दी थी कि यदि मजिस्ट्रेट सभी सूचीबद्ध गवाहों की जांच पर जोर नहीं देता है और शिकायतकर्ता को केवल उनमें से कुछ की जांच करने और सत्र न्यायालय में मामला करने की अनुमति देता है तो अदालत में सिर्फ उन गवाहों की जांच होगी जिनकी पहले मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच की गई थी और अन्य गवाहों की नहीं जिनकी  शिकायतकर्ता द्वारा जांच नहीं की गई थी। यह तर्क दिया गया था कि यदि मुकदमे के दौरान सत्र न्यायालय सभी गवाहों की जांच करने का प्रस्ताव करता है, जिनमें मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच करने के लिए छोड़े गए थे, तब अभियुक्त को उनके पहले के वक्तव्यों का लाभ नहीं मिल सकता ताकि ट्रायल के दौरान किसी भी विरोधाभास या सुधार को इंगित करने के लिए उनका सामना किया जा सके।

न्यायमूर्ति राव ने जी सुब्बा नायडू और अन्य बनाम तल्लुरी महालक्ष्मामा में उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले पर भरोसा किया जिसमें यह माना गया कि शिकायतकर्ता के लिए सीआरपीसी की धारा 202 के तहत जांच में सभी गवाहों को प्रस्तुत करना जरूरी नहीं है ।

 इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा: "इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अनुसार इस तरह के एक उदाहरण में एकमात्र सीमा है, मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा और गवाहों की जांच की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि  अगर न्याय की आवश्यकता है कि सीआरपीसी की धारा 311  के तहत प्रक्रिया का पालन करके कुछ और गवाहों की जांच की जानी है तो अदालत किसी अन्य गवाह की जांच कर सकती है लेकिन अदालत के गवाह के रूप में, शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में नहीं । "

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