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पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित बंगलों को 1 महीने के भीतर खाली किया जाना चाहिए: MP हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
29 Jun 2018 5:13 AM GMT
पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित बंगलों को 1 महीने के भीतर खाली किया जाना चाहिए: MP हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा [आर्डर पढ़े]
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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक महीने के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री को आवंटित बंगले खाली करने  का निर्देश दिया है।

 मुख्य न्यायाधीश हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति ए के श्रीवास्तव की बेंच ने मध्य प्रदेश मंत्री (वेतन एवं भत्ता) संशोधन अधिनियम , 2017 को धारा 5 (1) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है।

 इस प्रावधान ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को किसी भी किराए के भुगतान के बिना अपने पूरे जीवन सरकारी बंगलों का उपयोग करने की अनुमति दी थी। आदेश के साथ पूर्व मुख्य मंत्री कैलाश जोशी, दिग्विजय सिंह और उमा भारती आदि को राज्य में अपने सरकारी बंगलों से हाथ धोना पड़ेगा।

 न्यायालय रौनक यादव द्वारा दायर याचिका सुन रहा था, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगलों के आवंटन को चुनौती दी थी और आरोप लगाया था कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कर रहा है। यादव ने पिछले महीने दिए गए फैसले पर अदालत का ध्यान भी खींचा था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास लेने से रोक दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास आवंटित करने पर चिंता जताई थी। यह मानते हुए कि वे लाभ के हकदार नहीं थे, बेंच ने कहा था, "एक बार ऐसे व्यक्तियों द्वारा  सार्वजनिक कार्यालय को छोड़ने के बाद वो आम आदमी से अलग कुछ भी नहीं हैं।

 उनके द्वारा आयोजित सार्वजनिक कार्यालय इतिहास का विषय बन जाता है और इसलिए विशेष विशेषाधिकारों के लाभ के हकदार व्यक्तियों की विशेष श्रेणी के रूप में सार्वजनिक कार्यालय के पिछले धारकों को वर्गीकृत करने के लिए उचित आधार नहीं बन सकता है। "

इस फैसले को देखते हुए उच्च न्यायालय ने लगाए गए प्रावधान को भी रद्द कर दिया, "लोक प्रहरी (सुप्रा) के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए कारणों से हम पाते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री को मंत्रियों के बराबर नहीं माना जा सकता और ये अधिनियम  भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने के लिए बनाया गया।

इसलिए उपरोक्त उल्लिखित फैसले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए कारणों से अधिनियम की धारा 5 में संशोधन को रद्द किया जाता है।"

हालांकि अन्य भत्तों से संबंधित प्रश्न  यादव या किसी और द्वारा उचित याचिका में उठाए जाने के लिए खुला छोड़ दिया गया।


 
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