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क्या बार एसोसिएशन एक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने से वकील को रोक सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने MP सरकार, BCI को नोटिस जारी किया [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
16 Jun 2018 3:04 PM GMT
क्या बार एसोसिएशन एक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने से वकील को रोक सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने MP सरकार, BCI को नोटिस  जारी किया [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर जिला बार एसोसिएशन के उसके लिए पेश होने पर वकीलों पर रोक लगाने के खिलाफ एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर  मध्य प्रदेश राज्य और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। उस व्यक्ति ने बार एसोसिएशन द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव को रद्द करने की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर  इस तरह के एक प्रस्ताव को पारित करने लिए वकीलों की संस्था की “ फाउंडेशन शक्तियों" को जानने की मांग की है।

याचिकाकर्ता के लिए उपस्थित वकील एलिज़ा बार ने वकील बॉडी को अपने मुव्वकिल के प्रति एक व्यक्तिगत वकील के कर्तव्यों के निर्वहन में दखल देने से रोकने की गाइडलाइन तैयार करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया को दिशा निर्देश जारी करने की मांग की है।

“ वर्तमान याचिका में शिकायत यह है कि बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित किया है कि कोई वकील उपस्थित नहीं होना चाहिए और याचिकाकर्ता का बचाव नहीं करना चाहिए।”

न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने आदेश दिया, "उत्तरदायी संख्या 1  (मध्य प्रदेश राज्य) और 2 (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) को नोटिस जारी किया जाता है।”  मामला अब अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

तत्काल मामले में याचिकाकर्ता और उनकी अलग रह रही पत्नी एक दूसरे के खिलाफ कई केस लड़ रहे हैं।  मार्च में वह इन मामलों में से एक में सुनवाई में भाग लेने के लिए जबलपुर में अदालत में थे। अदालत की सुनवाई के बाद, उत्तरदाताओं में से एक (याचिका में उत्तरदाता संख्या 6) ने झूठा आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने उसे पीटा है।

 इससे अदालत परिसर में हंगामा हुआ और याचिकाकर्ता को पीटा गया और सिविल लाइन पुलिस स्टेशन ले जाया गया जहां से उसे एक हफ्ते बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया।

 15 मार्च को याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा कर दिए जाने के दिन, जबलपुर जिला बार एसोसिएशन द्वारा पारित प्रस्ताव के बारे में सूचित किया गया कि कोई भी वकील याचिकाकर्ता के लिए पेश नहीं होगा।19 मार्च को एक समाचार पत्र की रिपोर्ट ने पुष्टि की कि इस प्रभाव के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया है। 16 मई को याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत की जहां उन्होंने पुलिस हिरासत में अपने उत्पीड़न का मुद्दा भी उठाया। कोई निवारण नहीं होने के बाद याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की है।


 
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