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‘इस अदालत ने याचिका का अंतिम निपटारा नहीं किया था‘ सुप्रीम कोर्ट की आलोचना के बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक लाइन के आदेश पर खुद का किया बचाव [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
30 May 2018 8:44 AM GMT
‘इस अदालत ने याचिका का अंतिम निपटारा नहीं किया था‘ सुप्रीम कोर्ट की आलोचना के बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक लाइन के आदेश पर खुद का किया बचाव [आर्डर पढ़े]
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उच्च न्यायालय ने कहा कि इस अदालत ने उपरोक्त संशोधन याचिका पर अंततः एक पंक्ति आदेश से फैसला नहीं किया था

इस साल की शुरुआत में पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश को पूर्ण करके एक पंक्ति में एक संशोधन याचिका का निपटारा करने के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की आलोचना की थी।

जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट में इस मामले को फिर से भेजते हुए कहा था कु हमें उच्च न्यायालय को याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि कई निर्णयों में यह कहा गया है कि इस तरह का निर्णय अनुमति योग्य नहीं है।

इसके बाद इस मामले को न्यायमूर्ति एबी चौधरी की अध्यक्षता में उच्च न्यायालय की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया, जिन्होंने अपने पहले आदेश को स्पष्ट किया कि उन्होंने अंततः याचिका का निपटारा नहीं किया था बल्कि

नियम जारी करके केवल अंतिम सुनवाई के लिए मामला स्वीकार किया गया और इस प्रकार मामला अंतिम सुनवाई के लिए लंबित रखा जाना आवश्यक था।

  निम्नलिखित आदेश था जिसने उच्चतम न्यायालय की आलोचना आमंत्रित की थी।   "नियम। प्रतिद्वंद्वी दलों की दलीलें सुनी।

इस अदालत द्वारा पारित 31.08.2017 के अंतरिम आदेश को पूर्ण किया गया है। सुनवाई अदालत नियमित ट्रायल के साथ आगे बढ़ सकती है। "

इस आदेश को समझाते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा: "उपर्युक्त आदेश से पता चलता है कि इस अदालत ने नियम जारी किया, जिसका अर्थ है 'नियम निसी' कि मामला अंतिम सुनवाई के लिए दाखिल किया  गया और 31.08.2017 को दिए गए अंतरिम आदेश को पूर्ण किया गया और दिशा निर्देश दिया गया कि   कि ट्रायल कोर्ट  नियमित ट्रायल के लिए आगे बढ़ सकता है। हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि रजिस्ट्री ने वेबसाइट पर प्रकाशित "नियम" शब्द के बारे में गलत धारणा या ज्ञान की कमी के तहत कहा कि संशोधित याचिका का अंततः इस न्यायालय द्वारा निपटारा किया गया था। "

मुकदमा

हत्या के मामले में अभियुक्त ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी जिसने  मृतक की मां द्वारा दायर एक आवेदन की अनुमति दी थी जिससे किसी व्यक्ति को गवाह के रूप में बुलाया जा सके। आरोपी ने दलील दी कि पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज किए गए गवाह का कोई बयान नहीं था। अंततः याचिका का निपटारा करते हुएउच्च न्यायालय ने कहा: "यदि अभियोजन पक्ष गवाह के रूप में उसकी गवाही   या उद्धृत करना चाहती थी तो सीआरपीसी की धारा 173  के तहत रिपोर्ट का हिस्सा और पार्सल होना चाहिए था जो पुलिस के केस का हिस्सा नहीं है।

पुलिस मामले में यह पहला सिद्धांत है। इस अनिवार्य प्रक्रिया की अनुपस्थिति में मुझे नहीं लगता कि मुकदमा चलाने वाली एजेंसी को छोड़कर अभियोजन पक्ष को किसी अन्य व्यक्ति या एजेंसी या शिकायतकर्ता द्वारा एेसा करने की अनुमति दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहने के लिए मुकदमा न्यायालय कौशल्या देवी द्वारा दायर आवेदन के आधार पर कार्य नहीं कर सकता, जिन्होंने धारा 161 सीआरपीसी के तहत मूल कथित वक्तव्य भी दायर नहीं किया है, बल्कि एक फोटोकॉपी दायर की है जिसमें किसी भी तारीख और साइन भी नहीं हैं। जांच अधिकारी द्वारा बताए गए अनुसार धारा 173 सीआरपीसी के तहत इसे किसी भी रिपोर्ट का हिस्सा और पार्सल नहीं बनाया गया था। यदि राज्य द्वारा दायर अभियोजन पक्ष में इस तरह की कार्यवाही को अनुमति दी जाती है तो कानून का जनादेश और निष्पक्ष ट्रायल की अवधारणा का उल्लंघन किया जाएगा, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है। "


 
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