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पीएमएनआरएम में पैसा देने वालों का नाम उजागर करे या नहीं, इस पर दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दिया विभाजित फैसला [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
28 May 2018 7:37 AM GMT
पीएमएनआरएम में पैसा देने वालों का नाम उजागर करे या नहीं, इस पर दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दिया विभाजित फैसला [निर्णय पढ़ें]
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दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) में पैसा देने वाले लोगों के नाम सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत उजागर करने के मामले को लेकर विभाजित फैसला दिया है।

न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति सुनील गौर की पीठ ने कार्यवाहक न्यायाधीश गीता मित्तल को इस मामले को रेफ़र किया था और पूछा था कि -

“क्या सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(h)(d) के तहत प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) सार्वजनिक प्राधिकरण है कि नहीं और कोष के कामकाज को लेकर विभिन्न सूचनाएं क्या इस अधिनियम के तहत उपलब्ध कराई जा सकती है या नहीं?”

असीम टक्यार ने इस कोष में राशि देने वालों और इससे राशि प्राप्त करने वालों के नाम, राशि और इनके लाभार्थियों के बारे में तफसील के साथ जानकारी माँगी थी। सीपीआईओ ने अधिनियम की धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए जानकारी देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि इससे निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

पर सीआईसी ने टक्यार के पक्ष में फैसला दिया और पीएमएनआरएफ को आदेश दिया कि इस कोष में दान देने वाले संस्थाओं का नाम वह सार्वजनिक करे। कोर्ट ने इस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई के बाद उक्त फैसला दिया।

न्यायमूर्ति भट के विचार

न्यायमूर्ति भट ने कहा कि पीएमएनआरएफ अधिनियम की धारा 2(h) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है और अब यह देखना है कि इसे सार्वजनिक प्राधिकरण कहा जा सकता है या नहीं।

इसके बाद उन्होंने कहा कि पीएमएनआरएफ वास्तविक में एक सार्वजनिक प्राधिकरण है और कहा कि इसकी स्थापना के लिए नोटिस प्रधानमंत्री ने खुद सरकार की ओर से जारी किया था।

उन्होंने कहा, “इस अदालत का यह मानना है कि प्रधानमंत्री ने लोगों से इसमें राशि देने की मांग की और एक समिति गठित की जिसमें प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और राज्यों के शीर्षस्थ मुलाजिमों को इसका ‘प्रबंधक’ बताया और इस स्थिति में पीएमएनआरएफ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इसकी स्थापना व्यक्तिगत क्षमता में किया गया। ये कार्य सरकार के हैं जिसे प्रधानमंत्री ने अंजाम दिया है”।

इसके अलावा, पीएमएनआरएफ को एक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया गया ताकि इसको आयकर में छूट मिल सके, स्थाई खाता संख्या (पीएएन) प्राप्त किया जा सके और इस कोष का प्रबंधन उचित सरकार द्वारा जारी आदेश के तहत है। इसलिए पीएमएनआरएफ आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h)(d) के तहत अवश्य ही एक ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ है।”

न्यायमूर्ति भट ने कहा कि जनता को इस कोष के प्रबंधन के बारे में जानकारी हासिल करने का अधिकार है। उन्होंने इसके बारे में सूचना देने से निजता के अधिकार के उल्लंघन की बात को भी नकार दिया।

न्यायमूर्ति गौर के मत

न्यायमूर्ति गौर ने इसके अलग मत व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पीएमएनआरएफ अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है क्योंकि इसे न तो संसद द्वारा गठित किया गया है और न ही सरकार द्वारा और इसका प्रबंधन सरकारी मुलाजिम अपनी सरकारी क्षमता में नहीं करते।

उन्होंने कहा, “पूरी तरह से चैरिटेबल कारण से अपीली ट्रस्ट की स्थापना की गयी और न तो इस ट्रस्ट के फंड का प्रयोग किसी सरकारी परियोजना के लिए होता है और न ही किसी सरकारी नीति के तहत इसके फंड का प्रबंधन होता है। इस स्थिति में कैसे इस ट्रस्ट को ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ माना जा सकता है।

इस तरह इस बारे में उनकी राय न्यायमूर्ति भट की राय से अलग है और उन्होंने सीआईसी के इस आलोच्य आदेश को निरस्त कर दिया।


 
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