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CEC और EC को हटाने की प्रक्रिया समान नहीं हो सकती: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

LiveLaw News Network
28 April 2018 5:13 AM GMT
CEC और EC को हटाने की प्रक्रिया समान नहीं हो सकती:  केंद्र  ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
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 केंद्र ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने की प्रक्रिया मुख्य चुनाव आयुक्त के समान नहीं हो सकती और उस नियम की मांग को खारिज कर दिया।

केंद्र ने कहा कि CEC को पद से हटाने के लिए लंबी और एक स्तरित प्रक्रिया है जिसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह से रखा गया है जबकि सीईसी की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा ईसी को हटाया जा सकता है।

 सर्वोच्च न्यायालय के वकील और दिल्ली भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने एक पीआईएल में ये सवाल उठाया था। केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाली अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​की पीठ को बताया कि "उपर्युक्त प्रार्थना गलत है, और टीएन शेषन बनाम भारत संघ, (1995) 4 एससीसी 611 के मामले में इस माननीय न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय के खिलाफ है। उपर्युक्त निर्णय याचिकाकर्ता द्वारा यहां गलत तरीके से गलत तरीके से पढ़ा जा रहा है कि इस माननीय न्यायालय ने संकेत दिया है कि चुनाव आयुक्त (ईसी) सभी पहलुओं में मुख्य चुनाव आयुक्त  (सीईसी) के बराबर हैं। इसके विपरीत अनुच्छेद 324 (5) जो सीईसी और ईसी को हटाने के विभिन्न शिष्टाचार प्रदान करता है, विशेष रूप से मान्य होने के रूप में है।”

 एएसजी ने कहा, " स्थापना के बाद से ईसीआई एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से सुचारू रूप से काम कर रहा है और याचिका में प्रस्तावित  संवैधानिक और वैधानिक संशोधन को उचित ठहराने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सामग्री नहीं रखी गई है। यह सम्मानपूर्वक दोहराया जाता है कि किसी भी विषय पर कानून बनाना समग्र आवश्यकता के आधार पर विधानमंडल का विशेषाधिकार है।”

 आनंद ने कहा कि उपरोक्त प्रार्थना पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है और यह विधायिका के विशेष डोमेन के भीतर ही है। एएसजी को सुनने के बाद पीठ ने चार सप्ताह के बाद अंतिम निपटारे  के लिए समय तय किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी को केंद्र सरकार को एक पीआईएल पर रुख साफ करने को कहा था जिसमें चुनाव आयोग के लिए पूर्ण स्वायत्तता और अधिक आजादी की मांग और चुनाव आयुक्तों को हटाने के नियमों को बदलने की गुहार लगाई थी।

12 अप्रैल को चुनाव आयोग को अधिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता के लिए जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करते हुएआयोग ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि वह 1998 के बाद से इस आशय के संशोधन के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेज रहा है और  चुनाव संबंधी नियम बनाने की शक्ति की मांग कर रहा है। वर्तमान में ये शक्तिकेंद्र के पास है और इसे आयोग को देना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2 दिसंबर को इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की सहायता मांगी थी।

"दृष्टिकोण का अंतर" 

19 फरवरी को सुनवाई के शुरू में एजी ने कहा, "यह एक पीआईएल है जो चुनाव आयोग के लिए स्वायत्तता मांग रही है और ईसी को हटाने पर है। मेरी राय में कुछ अंतर है, इसलिए केंद्र के रुख को पहले मांगा जा सकता है।”

 इसके बाद पीठ ने आदेश दिया: "अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद चार सप्ताह के भीतर केंद्र की तरफ से एक प्रतिक्रिया दर्ज कर सकती हैं।” पीठ ने चुनाव आयोग को याचिका पर कुछ दस्तावेज रखने की अनुमति देने की अनुमति भी दी थी।

दरअसल वकील और दिल्ली भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने याचिका दायर की है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं कि  सुप्रीम कोर्ट में निहित नियम बनाने वाले प्राधिकरण की तर्ज पर भारत के चुनाव आयोग पर नियम बनाने के लिए उचित कदम उठाए जाएं औरइसे चुनाव संबंधी नियम और आचार संहिता बनाने के लिए सशक्त बनाया जाए।”

चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्रता को मजबूत करने और अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए उन्होंने सरकार से परामर्श के बाद चुनाव आयोग  को नियम बनाने के लिए एक नई रूपरेखा की मांग की।

 "भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के तहत चुनाव आयोग को कार्यपालिका / राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए ही आवश्यक नहीं है बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी है।” याचिका में कहा गया है।  उपाध्याय ने भारत के चुनाव आयोग को स्वतंत्र सचिवालय प्रदान करने और लोकसभा / राज्यसभा सचिवालय की तर्ज पर समेकित निधि दिए जाने के लिए केंद्र को दिशा निर्देश  देने की भी प्रार्थना की।

 याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता  जब तक कि CEC  और ECsसमान रूप से संरक्षित नहीं हो जाते। इसके व्यय को समांकेतिक निधि के रूप में लिया जाए और स्वतंत्र सचिवालय और नियम बनाने का अधिकार दिया जाए। याचिका में कहा गया कि गोस्वामी समिति, चुनाव आयोग और विधि आयोग सहित विभिन्न समितियां और कमीशन (255 वीं रिपोर्ट में) ने इस संबंध में सुझाव दिया है लेकिन कार्यपालिका ने अब तक उन अनुशंसाओं को लागू नहीं किया है।

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