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सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार से इंकार किया, युवती को सुरक्षा दी

LiveLaw News Network
11 April 2018 4:43 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार से इंकार किया, युवती को सुरक्षा दी
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को  26 वर्षीय एक युवती की शादी को इस आधार पर रद्द करने से इनकार कर दिया कि उसकी सहमति के बिना शादी की गई थी।  हालांकि कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से परिवार से उसकी सुरक्षा करने को कहा है।

अदालत को बताया गया था कि 14 मार्च को कर्नाटक के गुलबर्गा में एक राजनीतिज्ञ परिवार में सहमति के बिना युवती का विवाह किया गया था। उसने अपने पति के साथ रहने से इनकार कर दिया और  परिवार से अपने जीवन को खतरा देखकर वह दिल्ली आ गईं और दिल्ली महिला आयोग के पास रह रही है।

 मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति  डी वाई चंद्रचूड की बेंच ने युवती के लिए पेश वरिष्ठ  वकील इंदिरा जयसिंह से कहा कि हिंदू कानून के तहत सहमति की कमी के कारण शादी को रद्द नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता को तलाक के लिए एक सिविल कोर्ट में उपाय करना होगा और सहमति की कमी तलाक की मांग के आधार पर हो सकती है, जो सबूतों पर आधारित है।

  बेंच ने सुरक्षा प्रदान करने के लिए याचिका के दायरे को सीमित करते हुए दिल्ली पुलिस से  उसे  सुरक्षा देने के लिए कहा और संबंधित पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया कि युवती के माता-पिता, भाई और पति को उनकी प्रतिक्रिया के लिए याचिका की एक प्रति दें।

 याचिकाकर्ता 'एक्स' (नाम न्यायालय द्वारा रोका गया) का हवाला देते हुए कहा गया है कि अदालत से एक घोषणा होनी चाहिए कि सहमति के बिना एक  विवाह अवैध है।

 सीजेआई ने कहा कि "किसी भी तरह जबरन बल या धोखाधड़ी से प्राप्त सहमति से किया गया विवाह तलाक के लिए एक आधार हो सकता है। यह शादी के शून्य करार देने  के लिए एक आधार नहीं हो सकता और प्रावधान संविधान के विपरीत नहीं हैं।”

  सीजेआई ने हादिया केस का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, "हाल ही में हमने यह धारण किया है कि केरल उच्च न्यायालय एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए शादी को रद्द नहीं कर सकती। हम आपकी प्रार्थना को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? हम केवल पुलिस सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।”

न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि  कानून कहता है कि यदि सहमति जबरन प्राप्त की जाती है तो विवाह शून्य हो जाता है, यह निहित है कि शादी के लिए सहमति होनी  चाहिए। उन्होंने कहा, "हम  सिर्फ  इसलिए एक प्रावधान को असंवैधानिक नहीं घोषित कर सकते क्योंकि आप कह रहे हैं कि आपने शादी के लिए सहमति नहीं दी है।”

वकील ने तर्क दिया कि कानून में स्पष्टता की कमी है कि महिला को शादी के लिए अपनी सहमति देनी चाहिए और अदालत को इस प्रावधान को स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा  कि शादी से पहले भी दुल्हे और उनके परिवार को बताया गया कि वह शादी के लिए सहमति नहीं दे रही है। विवाह की तारीख को  अपने साथियों  के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को 'एसएमएस' भेजा। हालांकि पुलिस आई थी लेकिन कि उसे परिवार से धमकी दी गई कि शादी का विरोध न करे। वह शादी के तीन दिनों के भीतर विवाहित घर से बाहर आ गई और दिल्ली में शरण ले ली।  सीजीआई ने जयसिंह से कहा, "यदि आप (याचिकाकर्ता) अपने परिवार के साथ रहने के लिए बेंगलुरु जाना नहीं चाहते तो कोई भी आपको मजबूर नहीं कर सकता। दिल्ली में रहने के लिए न्यायालय को कोई  दिक्कत नहीं होगी और वह जहां भी जाना चाहती है उसे जाने दें। "

याचिकाकर्ता ने कहा है कि जीवन साथी को चुनने का उसका मूल अधिकार परिवार के सदस्यों ने बेरहमी से कुचल दिया है।याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 (ii) और 7 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है, जहां 'वैध सहमति' अनुपस्थित है और मनमानी और भेदभावपूर्ण प्रकृति मेंसंविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।  याचिकाकर्ता कर्नाटक से परिवार के चंगुल से भाग आयी है और दिल्ली पहुंच चुकी है।

 उसने संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की है कि उसके  जीवन और स्वतंत्रता  को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाए क्योंकि उसका परिवार कर्नाटक राज्य में राजनीतिक रूप से सक्रिय है और उनसे उसे खतरा है। अपनी जाति के बाहर किसी व्यक्ति से शादी करने की इच्छा के कारण उसने ऑनर किलिंग जैसी घटना की आशंका व्यक्त की है।

सुप्रीम कोर्ट मई में इसकी सुनवाई करेगा।

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