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सुप्रीम कोर्ट ने महिला व नाबालिग बेटे को सरंक्षण दिया, शक्तिशाली ससुराल वालों के उत्पीड़न से बचाने की लगाई है गुहार

LiveLaw News Network
11 April 2018 3:37 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने महिला व नाबालिग बेटे को सरंक्षण दिया, शक्तिशाली ससुराल वालों के उत्पीड़न से बचाने की लगाई है गुहार
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एक NRI महिला को राहत देते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि उन मामलों में महिला और उसके नाबालिग बेटे  के खिलाफ कोई दंडनात्कम कदम ना उठाया जिन्हें कथित तौर पर उसके बहिष्कृत पति और संयुक्त खुफिया समिति के पूर्व अध्यक्ष उनके ससुर ने जांच एजेंसियों की मदद से डराने के लिए दर्ज कराया है।

 मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने  महिला [नाम नहीं दिया गया है] और उसके 10 वर्षीय बेटे के पक्ष में दाखिल ऑल इंडिया वीमेन कांफ्रेंस की याचिका पर ये आदेश जारी किया है।

अदालत ने महिला पति आशु दत्त और उनके ससुर आरजे खुराना को एक नोटिस जारी किया, जो एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं जो संयुक्त खुफिया समिति के अध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं।

 संगठन द्वारा दायर की गई याचिका में केंद्र, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा और नागालैंड राज्यों को भी पक्षकार बनाया गया है।

इसमें मुंबई पुलिस के आयुक्त और पुलिस महानिदेशक भोपाल को भी शामिल किया गया है जहां महिला के खिलाफ  झूठी एफआईआर दर्ज की गई हैं।  हालांकि अदालत ने केंद्र, राज्यों और पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी नहीं किया और कहा कि महिला के खिलाफ किसी भी तरह के दबाव पर रोके के आदेश का सम्मान करने के लिए सभी प्राधिकरण बाध्य हैं।

 संगठन ने कठिनाई का वर्णन करते हुए निर्देशों के लिए प्रार्थना की है कि शिकायतकर्ता पति / पति के परिवार के सदस्यों  के लिए जरूरी है कि ऐसे मामलों में अलग रह रही महिला के महिलाओं के खिलाफ दायर शिकायतों का खुलासा करें कि क्या कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ आपराधिक शिकायत दर्ज करने से पहले वैवाहिक जीवन के अस्तित्व के बारे में जानकारी दी गई थी।

इसके साथ ही शक्तिशाली लोगों द्वारा पुलिस और कानून प्रवर्तन मशीनरी के दुरुपयोग को चुनौती दी गई है, जो राजनीतिक / नौकरशाह / पुलिस प्रतिष्ठान में विवादित / अलग रह रही महिला पर दबाव बना रहे हैं।

 उसने पुलिस को दिशानिर्देशों के निर्देश / जारी करने के लिए भी प्रार्थना की है, जहां मामलों में वैवाहिक विवादों का खुलासा किया जाता है, कम से कम एक न्यायिक सदस्य और एक महिला सदस्य के साथ 3 सदस्यीय समिति

 गठन होना चाहिए ताकि शिकायत की आवश्यक जांच हो सके।

विवादित / अलग रहने वाली महिलाओं के खिलाफ किसी भी एफआईआर / जांच की शुरूआत करने से पहले एक रिपोर्ट दाखिल करें।

 संगठन ने अदालत से आग्रह किया कि अलग रह  रहीं महिलाओं और उनके बच्चों के खिलाफ पति द्वारा दर्ज शिकायतों पर पुलिस को निरोधक कदम न लेने उठाने का निर्देश दिया जाए, जब तक कि 3 सदस्यीय समिति इसे  वास्तविक शिकायत नहीं मानते।

 तत्काल मामले में 47 वर्षीय थाई नागरिक और  भारत की प्रवासी नागरिक 17 साल की शादी के बाद 2012 में अपने पति आशू से अलग हो गई।   उन्होंने 'स्त्रीधन' और परिवार की कंपनियों का  हिस्सा देने से इनकार कर दिया, लेकिन उसे किसी भी उत्तर-पूर्वी राज्य पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की धमकी दी गई थी।

 याचिका में कहा गया है कि  29 जून 2012 को उसने और उनके  बच्चों ने बोर्डिंग पास प्राप्त कर लिया था, इमिग्रेशन पार कर लिया था और बैंकाक के लिए बोर्डिंग कर रहे थे लेकिन उन्हें राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 के तहत मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रोक लिया गया और कोई कारण नहीं बताया गया।  इसके बाद लगभग 4 बजे उन्हें जुहू पुलिस थाने में ले जाया गया और चोरी और अपहरण की  पति की शिकायत के बाद उन्हें हिरासत में लिया।

 जब उसके वकील ने पुलिस को बताया कि  अपहरण के लिए एक माँ पर कैसे आरोप लगाया जा सकता है। बाद में अगस्त, 2013 में मुंबई में EOW ने घर में छापा मारा। ये उत्पीड़न छह साल तक जारी रहा।

 याचिका में कहा गया है कि पिछले 6 वर्षों से दो राज्यों - महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में 12 से ज्यादा कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने उनके खिलाफ 40 से अधिक अपराधी शिकायतें और प्राथमिकी दर्ज की हैं जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में गिरफ्तारी का खतरा है।

उन्होंने दावा किया कि उनके नौकरों और चालक को भी बख्शा नहीं गया है। यहां तक ​​कि उनके खिलाफ एक लुक आउट नोटिस भी  जारी किया जा रहा है। वह मुंबई में अपने 10 वर्षीय बेटे के साथ रहती है।

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