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रोहिंग्या मामला : सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा, दिल्ली को शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या की जीवन स्थिति के बारे में 4 सप्ताह में रिपोर्ट देने को कहा

LiveLaw News Network
10 April 2018 5:05 PM GMT
रोहिंग्या मामला : सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा, दिल्ली को शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या की जीवन स्थिति के बारे में 4 सप्ताह में रिपोर्ट देने को कहा
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, डीवाई चंद्रचूड़ और एएम खानविलकर ने सोमवार को हरियाणा और दिल्ली सरकार को चार सप्ताह के भीतर शरणार्थी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

एएसजी तुषार मेहता ने शिविरों में जल, स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में रिपोर्ट पेश किया। इसके लिए दो दलों का गठन किया गया था जिसने मेवार, हरियाणा और  दिल्ली में मौजूद शिविरों का दौरा कर सुविधाओं की जांच की। मेहता ने बताया कि इन शिविरों में रोहिंग्या और भारतीय शरणार्थियों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव नहीं पाया गया...कुछ कमियाँ हो सकती हैं, स्वास्थ्य और स्वच्छता राज्य का विषय है और भारत सरकार इन कमियों के बारे में राज्यों को बताए और राज्यों से इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहेगी।

एक वकील ने एक याचिकाकर्ता की ओर से मेहता के इस दावे का विरोध किया और कहा : दिल्ली के अनेक शिविरों को ढहा दिया गया और 90 से ज्यादा शरणार्थी परिवारों को सड़कों पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है...600 से अधिक लोगों के लिए मात्र 6 शौचालय हैं...लगभग हर शरणार्थी डायरिया से पीड़ित है...कई लोगों की मौत हो चुकी है और इनसे छेड़छाड़ की घटनाएं होती हैं।”

वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने पीठ से शिविरों के चित्रों पर नजर डालने का आग्रह किया और कहा : मानसून आने वाला है ...गत वर्ष भी इन शिविरों में 2-3 फीट पानी लग गया था ...चूंकि केंद्र सरकार कहती है कि यह राज्यों की जिम्मेदारी है, कृपया कोर्ट के एक आयुक्त की नियुक्ति कीजिए जो हरियाणा और दिल्ली में इन शिविरों पर नजर रखे।

राज्यों के एडवोकेट ने कहा कि इन फोटो के साथ कोई हलफनामा नहीं है।

मेहता ने कहा, “हम शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने से पीछे नहीं हट रहे हैं ...लेकिन हम रोहिंग्या को ऐसी अतिरिक्त सुविधाएं नहीं दिला सकते जो शिविरों में भारतीयों को भी नहीं मिल रही है...हमारा मानना है कि ये गैर कानूनी आप्रवासी हैं ...ये लोग मेवार और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में मौजूद हैं...और केंद्र सरकार इनके इन स्थानों में प्रवेश की जांच करेगी ...पर ये वैसे ही हालात में रह रहे हैं जैसे भारतीय।”

जब सिंह ने कहा कि चिंता नागरिक और गैर नागरिकों का नहीं है बल्कि आधारभूत मानवाधिकारों का है, मेहता ने कहा : बांग्लादेश से इन गैर कानूनी प्रवासियों का प्रवेश पिछले 10-15 वर्षों से एक मुद्दा बना हुआ है। तो ऐसी स्थिति में ये याचिकाएं अब क्यों दायर की गई हैं? इस मामले में और भी कोई बातें हैं...”

मुख्य न्यायाधीश ने कहा : हम किसी भी तरह की सुविधा देने के लिए आदेश नहीं दे सकते पर अगर झुग्गी झोपड़ियों में रह रहे नागरिकों और शरणार्थी के बीच कोई भेदभाव है तो हम उसको समाप्त कर सकते हैं।

प्रतिवादियों के एक वकील ने कहा : “ये लोग शरणार्थी नहीं हैं गैर कानूनी प्रवासी हैं...अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिलने वाले अधिकार इस संदर्भ में लागू नहीं होते।” “इस कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि यहाँ तक कि गैर नागरिक भी अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक सुविधाओं के हकदार हैं”, यह कहना था वरिष्ठ एडवोकेट प्रशांत भूषण का।

एएसजी ने कहा, “कोई भेदभाव नहीं है...आम लोगों की मदद को उत्सुक इन लोगों को देखना चाहिए कि ये मौलिक सुविधाएं उन लोगों को भी दिया जा रहा है जो शिविर के बाहर रह रहे हैं और जहां से मलिन बस्तियां शुरू होती हैं ...सार्वजनिक हित सीमित नहीं हो सकते।”

उनकी चिंता का समर्थन करते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा : दो तिहाई मुंबई झुग्गी बस्तियों में रहती है ...दिल्ली में भी झुग्गी झोपड़ियों का बड़ा समूह है ...झुग्गी में रहने वाले सभी लोगों को बराबर मौलिक सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए न कि केवल शरणार्थियों को”।

भूषण ने कहा “अगर सरकार कह रही है कि अनुच्छेद 21 के अनुरूप शरणार्थियों को सुविधाएं दी जा रही हैं तो बेहतर है कि एक कोर्ट आयुक्त की नियुक्ति की जाए ...सरकार यह नहीं कह सकती कि नागरिकों को सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं सो शरणार्थियों को भी यह सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा सकती...” सीयू सिंह ने कहा, “सभी झुग्गियों में बिजली, पानी, शौचालय और स्वच्छता की सुविधा है”।
वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार ने कहा, “मानवाधिकार केवल वैधानिक मत नहीं है...हर नागरिक को हर तरह की सुविधाएं दी जानी चाहिए...पर यह कहना कि जो नागरिकों को नहीं दिया जा रहा है वह शरणार्थियों को कैसे दिया जा सकता है, इस तरह का बयान देश के शीर्ष अदालत में नहीं दिया जाना चाहिए...यह बात मानवीय गरिमा की है...”

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने हस्तक्षेप की अनुमति माँगी और कहा : मैं पिछले 20 सालों से शरणार्थी क़ानून से जूझ रहा हूँ ...प्रश्न यह है कि क्या हम लोगों के एक विशेष वर्ग से निपट रहे हैं या नहीं...ये लोग कहीं और नहीं जा सकते...इनके पास काम करने का परमिट नहीं है...ये वोट नहीं डाल सकते...वे किसी विधायक के सामने अपनी तकलीफ़ बयाँ नहीं कर सकते जो उन्हें गैर कानूनी मानता है ...अगर वे कोई खोमचा लगाकर अपनी आजीविका कमाना चाहते हैं तो पुलिस उन्हें परेशान करती है...बर्मा, तिब्बत और श्रीलंका के शरणार्थियों के लिए भी यही सारी मुश्किलें थीं...हम यह कहकर इस बहस को कम नहीं कर सकते कि आम लोगों के प्रति भी दायित्व है...”

उन्होंने सुझाव दिया कि कोर्ट एक विशेष अधिकारी इस कार्य के लिए नियुक्त करे जिसका विरोधी पक्ष ने विरोध किया।

वरिष्ठ वकील सजन पूवय्या ने कहा : इन गैर कानूनी प्रवासियों के पास आधार कार्ड है, राशन कार्ड है और मोबिल फ़ोन भी हैं... जहाँ संसाधन कम हैं वहाँ झुग्गी में रहने वाले नागरिकों को क्या केक में दांत गड़ाने का अधिकार नहीं है?...कृपया इसकी  अनुमति नहीं दी जाए। उन्होंने एएसजी की चिंताओं से इत्तिफाक जताया।”

वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि शरणार्थियों के मामले को राजनयिक तरीके से सुलझाना चाहिए....रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए कोई विशेषाधिकार वाला क्षेत्र नहीं बनाया जा सकता...”

सोमवार को पीठ को बताया गया कि दिल्ली में दो, हरियाणा के मेवार में छह और फरीदाबाद में 3 रोहिंग्या शरणार्थी शिविर हैं। इस मामले की अगली सुनवाई अब 9 मई को होगी।

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