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खाप का “बलात्कार आदेश": 5 लाख मुआवजा जमा करें; आरोपी के खिलाफ झूठा मामले दर्ज करने में पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच हो : सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिए [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
9 April 2018 3:23 PM GMT
खाप का “बलात्कार आदेश: 5 लाख मुआवजा जमा करें; आरोपी के खिलाफ झूठा मामले दर्ज करने में पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच हो : सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिए [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश राज्य को दो दलित महिलाओं के बलात्कार की  खाप पंचायत की घोषणा से संबंधित मामले में कोर्ट की रजिस्ट्री में पांच लाख रुपये जमा करने के आदेश दिए हैं।  पंचायत ने ऊपरी जाति जाट समुदाय की एक विवाहित लड़की के साथ उसके भाई के भागने के बदले के रूप में उनके चेहरे को काला करने के बाद उसकी दो बहनों की नग्न परेड और  बलात्कार करने का आदेश दिया था।

 महिला द्वारा दायर की गई याचिका के अनुसार, जाट समुदाय की विवाहित महिला उनके भाई के साथ भाग गई थी, लेकिन लड़की के परिवार और यूपी पुलिस के लगातार दबाव के कारण जल्द ही वापस लौटना पड़ा। हालांकि उनकी वापसी के बाद याचिकाकर्ता के भाई को कथित तौर पर एक झूठे नारकोटिक्स मामले में फंसाया गया और बाद में गिरफ्तार किया गया। उसने आगे कहा कि पुलिस द्वारा उसके परिवार के सदस्यों का अपहरण किया गया और अत्याचार किया गया था।

 उसी समय मानवाधिकार  संगठन, एमिनेस्टी इंटरनेशनल ने बहनों से बलात्कार और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने से बचाने के लिए एक याचिका दाखिल कर दी। एमिनेस्टी  की याचिका में कहा गया है, "इस घृणित सजा को कोई भी सही नहीं ठहरा सकता है," यह कहते हुए, "यह उचित नहीं है और यह कानून के खिलाफ है। मांग है कि स्थानीय अधिकारी तुरंत हस्तक्षेप करें। "

इस घटना की जांच करने के बाद न्यायमूर्ति जे  चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने गुरुवार को कहा कि याचिकाकर्ता के भाई से कोई मादक पदार्थ नहीं मिला है।

पीठ ने आगे कहा कि विवाहित महिला द्वारा दिए गए बयान के मुताबिक, "कोई अप्रिय घटना नहीं हुई" और उसके साथ उसका कोई संबंध नहीं था। इसलिए  इस संबंध में पुलिस को केस को बंद करने की रिपोर्ट दर्ज करने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वह "पीड़ा की भरपाई करने के लिए जिसकी वजह से रवि और उसके परिवार को परेशानी उठानी पड़ी, 5 लाख रुपये की राशि जमा करे।

10 दिनों के भीतर राशि जमा करने के बाद अदालत उसे या किसी अन्य क्षतिपूर्ति के लाभार्थियों का निर्धारण करेगी।

इसके साथ ही पुलिस अधिकारी पर अभियुक्त के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने का आरोप लगाने पर दाखिल हलफनामे पर “ संपूर्ण असंतोष" व्यक्त किया गया।

 इस बात का जिक्र करते हुए कि आरोपियों के खिलाफ ऐसे मामलों को दर्ज करने में अन्य अधिकारियों की भूमिका पर विचार किया जाना चाहिए, "हमें 2.4.2018 के हलफनामे के बारे में पूरी तरह से असंतोष व्यक्त करना चाहिए कि पुलिस अधिकारी उप निरीक्षक अमन सिंह के खिलाफ  इन झूठे मामलों की परिणति के रूप में निंदा करने से संतुष्ट लगते हैं। सवाल ये है कि वो अकेले ही जिम्मेदार है या अन्य अधिकारी भी शामिल थे। इस संदर्भ में हम इस बात पर ध्यान दे सकते हैं कि बातचीत की प्रतिलिपि

इस प्रक्रिया में विभिन्न पुलिस अधिकारियों की व्यापक भूमिका का सुझाव देती है। इन पुलिस अधिकारियों की सहभागिता का निर्धारण करना आवश्यक है जिसके लिए एक उपयुक्त वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त किया जाता है, जैसा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 19 73 की धारा 36 के तहत माना गया है। " इस मामले को अब 10 दिनों के बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

 

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