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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने UPPSC को PCS प्रारंभिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनः मूल्यांकन करने का निर्देश दिया [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
2 April 2018 3:06 PM GMT
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने UPPSC को  PCS प्रारंभिक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनः मूल्यांकन करने का निर्देश दिया [निर्णय पढ़ें]
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) को पीसीएस की प्रारंभिक परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं का पुनः मूल्यांकन करने के लिए निर्देशित किया है। ये परीक्षा पिछले साल सितंबर में आयोजित की गई थी।

हालांकि न्यायमूर्ति पंकज मिठल और न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव की पीठ ने फिर से परीक्षा कराने की आवश्यकता नहीं समझी।

कोर्ट ग्यारह याचिकाओं के एक बैच को सुन रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि परीक्षा में कुछ प्रश्नों के जवाब या तो गलत थे, अस्पष्ट या भ्रामक थे। उन्होंने आगे आरोप लगाया था कि जवाब की कुंजी में कुछ जवाब गलत थे और कुछ सवालों के एक से अधिक सही उत्तर थे। कुल मिलाकर उनके द्वारा ऐसे 14 प्रश्न बताए गए थे।

आरोपों की सत्यता  की जांच के लिए  पीठ ने उन सवालों और उनके जवाब की प्रश्न-वार जांच की , जिसके बाद कहा कि वर्तमान मामले में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है और न्यायालय केवल तभी पुन: मूल्यांकन के लिए कह सकता है जब स्पष्ट रूप से दिखाया जाता है कि प्रश्नों के निर्धारण या उनकी सूचनाओं के उत्तर में भौतिक त्रुटि हुई है।

 कई उदाहरणों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने इस तरह की समीक्षा के दायरे को देखकर कहा, "... एक बात सुरक्षित रूप से समझी जा सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय बार-बार यह कहता है कि न्यायालय को चयन प्रक्रिया में दखल देने में बहुत धीमा , सावधान और चौकस रहना चाहिए।

 इसका मुख्य कारण यह है कि चयन प्रक्रिया की शुद्धता या निष्पक्षता बनाए रखी जानी चाहिए और छात्र को आयोग की गलती के लिए पीड़ित नहीं होना चाहिए क्योंकि एक छात्र का भविष्य दांव पर होता है।"

इसे आगे समझाया गया, "... न्यायालय, पुनः मूल्यांकन / जांच करने के दौरान  कुंजी उत्तर पत्र में अधिसूचित आयोग के उत्तर की शुद्धता का विश्लेषण करने के लिए तर्कसंगतता जांचने के लिए आकस्मिक  प्रक्रिया को नहीं अपना सकता। ... हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रश्नपत्र में जवाब की शुद्धता के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है। जब यह किसी भी अस्पष्टता के बिना प्रदर्शित किया जाता है कि आयोग द्वारा मुख्य सवाल में दिया गया उत्तर स्पष्ट रूप से गलत है, तब ही कोर्ट  आयोग द्वारा सुझाए गए उत्तर में हस्तक्षेप कर सकता  है। "

 कोर्ट ने फिर से 12 ऐसे प्रश्नों का पुनः मूल्यांकन करने का निर्देश दिया और फैसला सुनाया कि ऐसे अभ्यर्थी जो इस तरह के पुनर्मूल्यांकन के परिणामस्वरूप उत्तीर्ण होंगे, केवल वो मुख्य लिखित परीक्षा में शामिल होने वाले हकदार होंगे।


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