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सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे में रेप पीड़ितों के नाम उजागर करने पर उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल को लगाई फटकार : AOR की भी खिंचाई

LiveLaw News Network
27 March 2018 3:26 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामे में रेप पीड़ितों के नाम उजागर करने पर उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल को लगाई फटकार : AOR की भी खिंचाई
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  • "यह क्या हो रहा है? हमें समझ नहीं रहा है .. क्या आपको पता है कि एओआर की कुछ जिम्मेदारी है? आप एक चपरासी की तरह व्यवहारनहीं कर सकते। क्या आप जानते हैं कि ये (बलात्कार के पीड़ित का नाम देना ) एक अपराध है, आईपीसी के तहत आप पर मुकदमा चलाया जा सकता है? राज्य सरकार के अधिकारियों को भूल जाओ, आप इसे कैसे सत्यापित कर सकते हैं? "न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर ने उत्तराखंड के लिए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड्स से कहा। 

  • "उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने पीड़ितों के नामों के साथ शपथ पत्र प्रस्तुत किए हैं। यह बहुत ही आपत्तिजनक और कानून के विपरीत है और एक अपराध के बराबर है। " बेंच ने आदेश में कहा।


एक चौंकाने वाले मामले में  सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया फंड योजना के तहत मुआवजे के भुगतान से संबंधित हलफनामे में नाबालिगों सहित बलात्कार पीड़ितों के नाम देने पर नाराज होकर उतराखंड और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अफसरों को तलब कर लिया। कोर्ट ने इसे " अपराध"  और प्रावधानों का उल्लंघन" करार दिया।

बेंच निपुण सक्सेना द्वारा दायर निर्भया फंड  से संबंधित मुद्दे पर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

पीड़ितों के नाम देने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए अमिक्स क्यूरीवरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने मामले में कहा, "पूरी पीड़ित सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो गई है।”

उत्तराखंड द्वारा दायर किए गए हलफनामे में कई अन्य पहचान हुईं जैसे उनकी उम्र, अभिभावक का नाम और पूरा पता।

न्यायमूर्ति  मदन बी लोकुर ने राज्यों के लिए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड्स (एओआर) और वकील को कड़े शब्दों में कह दिया कि उन्हें भी अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है और उन्होंने कैसे बिना किसी सत्यापन के हलफनामे दाखिल कर दिए। "यह क्या हो रहा है? हमें समझ नहीं आ रहा है.. क्या आपको पता है कि एओआर की कुछ जिम्मेदारी है? आप एक चपरासी की तरह व्यवहार  नहीं कर सकते। क्या आप जानते हैं कि ये (बलात्कार के पीड़ित का नाम देना ) एक अपराध है, आईपीसी के तहत आप पर मुकदमा चलाया जा सकता है? " न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने पश्चिम बंगाल के महिला एवं बाल विभाग के संयुक्त सचिव और उत्तराखंड सरकार में अतिरिक्त सचिव (गृह) से स्पष्टीकरण मांगा और उन्हें तीन सप्ताह के बाद  अगली तारीख पर पेश होने को कहा।

 "यह कम से कम चौंकाने वाला तो है,” न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा,  "उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने पीड़ितों के नामों के साथ शपथ पत्र प्रस्तुत किए हैं। यह बहुत ही आपत्तिजनक और कानून के विपरीत है और एक अपराध के बराबर है। "

जब उत्तराखंड के एओआर ने कहा कि "मैं  हलफनामा वापस लेता हूं। मैं इसे वापस ले जाऊंगा।”

न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, "हम आपको वापस लेने की अनुमति नहीं देंगे। इसे हमारे साथ मोहरबंद कवर में रहे। ऐसे अधिकारियों ने इस तरह के हलफनामे दायर किए और हम उन्हें बुला रहे हैं।”

 15 फरवरी को सुनवाई  जस्टिस लोकुर उस समय नाराज हो गए थे जब पता चला कि मध्य प्रदेश, जो कि निर्भया निधि योजना के तहत सबसे अधिक राशि प्राप्त करता है,  यौन उत्पीड़न की शिकार के लिए केवल 6,000 से 6,500 रुपये का वितरण कर रहा था। पीठ ने कहा था,” आप क्या बलात्कार का मूल्य 6,500 रुपये लगा रहे हैं ? .क्या आप दान कर रहे हैं? "

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