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खाप पंचायत द्वारा शादी में विध्न डालना या इसे रोकना पूरी तरह अवैध : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
27 March 2018 7:33 AM GMT
खाप पंचायत द्वारा शादी में विध्न डालना या इसे रोकना पूरी तरह अवैध : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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एक महत्वपूर्ण आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि खाप पंचायत या किसी अन्य जमावड़े द्वारा आपसी सहमति से दो बालिगों द्वारा शादी को रोकने या रोकने के लिए कोई भी प्रयास पूरी तरह "अवैध" है।

इस मुद्दे पर एनजीओ शक्ति वाहिनी द्वारा दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा,न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की बेंच  ने अंतर-धर्म और अंतर-जाति विवाहों के खाप पंचायतों द्वारा विरोध को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय दिए हैं।

CJI  मिश्रा ने कहा कि "ये उपचारात्मक, निवारक और दंडात्मक उपाय तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि इस संबंध में कोई कानून लागू नहीं होता।”

पिछले सात मार्च को पीठ ने सम्मान के लिए हत्या यानी ‘ऑनर किलिंग’ केअपराध के संबंध में एनजीओ शक्ति वाहिनी की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

 सुनवाई के दौरान ASG पिंकी आनंद ने केंद्र सरकार की ओर से सुझाव दाखिल किए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में सरकार लॉ कमिशन की रिपोर्ट का अध्धयन कर रही है और जल्द ही कानून लेकर आएगी। तब तक कोर्ट कोई गाइडलाइन जारी कर सकता है। सुझाव में कहा गया कि शादी करने में अगर कोई बाधा पहुंचाता है तो राज्य सरकार उनके खिलाफ  कठोर कदम उठाए। सभी राज्य सरकारों के पास स्पेशल यूनिट है जो भी अपनी मर्जी से शादी कर रहे है, उन्हें सरंक्षण दिया जा सकता है। जोडे जब शादी के लिए रजिस्ट्रेशन करने के लिए जाए तो उसी समय उनको यह बता देना चाहिए कि उनकी जान को खतरा है। उन पुलिस वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाना चाहिए जो पुलिस वाले शिकायत के बावजूद भी कोई कदम नही उठाते है।

वहीं सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिर से दोहराया,"जहां आपसी सहमति से दो व्यस्क वैवाहिक संबंधों के लिए राजी होते हैं तोकोई भी व्यक्तिगत अधिकार, समूह के अधिकार या सामूहिक अधिकार उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते या जोडे को परेशान नहीं कर सकते।”

वहीं पिछली सुनवाई में खाप पंचायत के लिए पेश वकील ने कहा,"खाप पंचायतों ने अंतर जातीय और अंतर धर्म विवाहों को प्रोत्साहित किया है। हरियाणा में विषम लिंग अनुपात की वजह से 25 लाख स्थानीय लड़कों ने अन्य राज्यों में शादी की है। खाप पंचायत को समान गोत्र में शादी करने से ऐतराज है। उन्होंने कहा, मैं 'हुड्डा' हूँ; यह एक पुरानी परंपरा है कि एक हुड्डा दूसरे हुड्डा से शादी नहीं करेगा क्योंकि वो एक सामान्य पूर्वज से आए हुए माने गए हैं और इसलिए भाई बहन हैं। यहां तक ​​कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 में सपिंड में विवाह पर पाबंदी है। इसमें पिता के पक्ष से 5 डिग्री संबंधों के भीतर गणना है और माता के पक्ष में 3 डिग्री की गणना की जाती है। वैज्ञानिक रूप से यह भी साबित हो गया है कि ऐसे विवाहों में बच्चों की आनुवांशिकी पर एक विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।”

लेकिन मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने इससे इनकार किया, "हम खाप पंचायतों से इत्तेफाक नहीं रखते। कोई भी, ना ही पंचायत,  ना समाज, माता-पिता या किसी भी पार्टी के अन्य रिश्तेदार शादीमें हस्तक्षेप कर सकते हैं।” इसके बाद मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने टिप्पणी की,"हम यहाँ एक निबंध नहीं लिख रहे हैं। हम सपिंड या गोत्र से चिंतित नहीं हैं। हम शादी करने के लिए केवल दो वयस्कों के निर्णय में रुचि रखते हैं। अगर वैवाहिक स्थिति या संपत्ति के संबंध में कोई मुद्दा उठता है, तो अदालत निर्णय लेने की हकदार होगी।

बच्चेवैध या नाजायज हो सकते हैं जो विभाजन वाद में देखा जा सकता है।इसी तरह, यहां तक ​​कि शादी भी निरर्थक और शून्य हो सकती है। लेकिन आप इससे बाहर रहते हैं और कोई तृतीय पक्ष हस्तक्षेप नहीं करेगा। हमने पहले से ही विकास यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में ये स्पष्ट रूप से कहा है। "

खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करते हुए एक अन्य वकील ने एमिक्स क्यूरीराजू रामचंद्रन द्वारा दिए गए सुझावों के बारे में चिंता व्यक्त की,"'सम्मान की हत्या' इन घृणित अपराधों के लिए सम्मानजनक शब्द है। हालांकि गोत्र के कारण इनमें से केवल 3 प्रतिशत हत्याएं होती हैं। सम्मान के लिए हत्याओं पर रोक लगाने के लिए 20 से ज्यादा खाप पंचायतों ने प्रस्ताव पारित किए हैं।इसलिए इस संबंध में 'गैरकानूनी सभा’' शब्द का उपयोग मानहानि के बराबर है।

जवाब में वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा, “ 242 वें कानून आयोग की रिपोर्ट मेंखाप पंचायत का शब्द का इस्तेमाल किया गया है। अदालत किसी तटस्थ नाम का उपयोग कर सकती है, जैसे विवाह निषेध सभा। इसके अलावा, 1955 के अधिनियम में केवल सपिंड विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है जो कि सगोत्र विवाह से अलग है।”

हाल ही में हुई अंकित सक्सेना की हत्या का उदाहरण देकर इसके बारे में चर्चा करने के लिए याचिका के दायरे का विस्तार करने की बात को खारिज करते हुए बेंच ने सम्मान के लिए हत्याओं से निपटने के लिए अधिवक्ताओंसे पुलिस समितियों के गठन पर सुझाव मांगा था। बेंच ने एएसजी पिंकी आनंद को निर्देश दिया था कि वह एमिक्स क्यूरी के सुझावों पर राज्य के जवाब को शीघ्रता से दाखिल करें क्योंकि ये एक गंभीर मुद्दा है।


  
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