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INX मीडिया मामला : दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्ति को जमानत दी, कहा सीबीआई को पूर्व सूचना दिए बिना कोई बैंक खाता बंद ना करे [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
24 March 2018 8:53 AM GMT
INX मीडिया मामला : दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्ति को जमानत दी, कहा सीबीआई को पूर्व सूचना दिए बिना कोई बैंक खाता बंद ना करे [आर्डर पढ़े]
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को आईएनएक्स मीडिया मामले में सीबीआई द्वारा दर्ज केस में कार्ति चिदंबरम को जमानत देते हुए कहा कि उनकी न्याय से भागने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि समाज में उनकी जड़ें हैं, उनके माता-पिता वरिष्ठ वकील हैं और उनके पास देखभाल करने के लिए एक परिवार भी है।

साथ यह भी ध्यान में रखते हुए कि 28 फरवरी से 12 मार्च तक सीबीआई ने पुलिस हिरासत के दौरान किसी भी चौकाने वाली  सामग्री को बरामद नहीं किया है।

 जस्टिस एसपी गर्ग ने 12 मार्च के बाद तिहाड़ जेल में रहने वाले कार्ति को जमानत दी।

"याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप मुख्यतः भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 8 के तहत अपराध के लिए दंडनीय है। धारा 8 के तहत दंडनीय अपराध के कमीशन के लिए सजा एक अवधि के लिए कारावास है जो जुर्माने के साथ पांच साल तक हो सकती है। निर्धारित स्थिति यह है कि आम तौर पर जमानत को तब तक नकारा नहीं  जाना चाहिए जब तक कि अपराध का आरोप गंभीर श्रेणी का ना हो  और कानून द्वारा उसका दंड अत्यंत कठोर ना हो।

न्यायपालिका से भागने की याचिकाकर्ता की कोई संभावना नहीं है। उनके माता-पिता वरिष्ठ अधिवक्ता हैं; उनके पास परिवार है;जस्टिस गर्ग ने कहा कि उनकी समाज में जड़ें हैं और पहले कोई अपराध नहीं किया है। " ये कहते हुए जस्टिस गर्ग  ने 10 लाख रुपये की श्योरटी व निजी मुचलके पर जमानत दी।

अदालत ने जमानत पर रिहा होने के लिए कार्ति पर निम्नलिखित शर्तें लगाईं :

 ( i) याचिकाकर्ता अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेगा; वह अपने पासपोर्ट को ट्रायल कोर्ट से जमा करेगा अगर अब तक जमा नहीं किया गया है।

 (ii) वह सीबीआई को पूर्व सूचना दिए बिना  भारत या विदेश में अपने किसी भी बैंक खाते को बंद नहीं करेगा; किसी भी व्यावसायिक इकाई की संस्था या संरचना को बिना सीबीआई को पूर्व सूचना दिए परिवर्तित नहीं करेगा जिनसे वो जुड़ा हुआ है।

(iii) जब आवश्यक हो तो वह जांच में शामिल होने के लिए सीबीआई के पास उपलब्ध होगा।

( iv) आवासीय पता बदलने या मोबाइल नंबर में परिवर्तन के मामले में सीबीआई को पहले से सूचित किया जाएगा।

 (v) याचिकाकर्ता अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क नहीं करेगा; सबूत के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा; किसी भी गवाह को

किसी भी तरीके से आपराधिक रूप से नहीं धमकाएगा।

अपने आदेश में न्यायमूर्ति गर्ग ने कहा कि "तर्क के दौरान एक विशिष्ट प्रश्न उठाया गया था और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से पूछा गया कि क्या 28.02.2018 से 12.03.2018 तक पुलिस हिरासत के दौरान कोई भी आरोपित  सामग्री याचिकाकर्ता के कब्जे से बरामद हुई है।   निर्देशों पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि ऐसी कोई रिकवरी नहीं है।"

 अदालत ने आगे कहा कि दिनांक 09.03.2018 के आदेश का रिकॉर्ड है कि दो अलग-अलग आवेदन, एक इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी को दिल्ली लाकर याचिकाकर्ता की उपस्थिति में दिल्ली की जगह की पहचान करने के लिए अनुमति और दूसरे में   सह-आरोपी भास्कररामन के साथ याचिकाकर्ता का आमना सामना कराने की इजाजत मांगी कई। जब इन आवेदनों पर दो बजे  विचार करने के लिए उठाया गया, सीबीआई ने याचिकाकर्ता की मौजूदगी में दिल्ली में जगह की पहचान के लिए इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुर्तजेजा को दिल्ली लाए जाने की इजाजत देने की अनुमति मांगने वाले आवेदन पर जोर नहीं दिया। इसी कारण अदालत ने उसे खारिज कर दिया।

 पीठ ने यह भी कहा कि सीबीआई एफआईआर दाखिल करने में अत्यधिक देरी का कारण नहीं बता पाई।

"याचिकाकर्ता को सह-आरोपी भास्कररामन (जमानत पर रिहा होने के बाद) के साथ आमना सामना कराने की अनुमति दी गई थी।

इस घटना के मुताबिक 2007-2008 में  'आईएनएक्स मीडिया' ने कथित तौर पर एफआईपीबी की मंजूरी के बिना अनधिकृत डाउनस्ट्रीम निवेश करने के लिए याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के साथ आपराधिक षड्यंत्र में प्रवेश किया और सरकारी अफसरों को प्रभावित करके याचिकाकर्ता द्वारा दखल दिया गया।

निर्विवाद रूप से प्रश्न में एफआईआर 15.05.2017 को 'स्रोत' सूचना पर दर्ज की गई थी। एफआईआर दर्ज करने में अपर्याप्त देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, "उन्होंने कहा।

अदालत का ध्यान इस तथ्य के लिए भी था कि जांच के दौरान  इंद्राणी मुखर्जी के धारा 161 सीआरपीसी और 164 सीआरपीसी के तहत 07.12.2017 और 17.02.2018 को  बयान दर्ज किए गए थे और उन्होंने याचिकाकर्ता के खिलाफ जल्द कार्रवाई क्यों नहीं की, इसके लिए कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया था और

दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया जबकि  प्राथमिकी में पीटर मुखर्जी को अभियुक्तों में से एक बताया गया है।

पीठ ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि "जांच के दौरान अभियोजन पक्ष ने धारा 161 सीआरपीसी के तहत वरिष्ठ अधिकारियों के बयान दर्ज किए। जो आवश्यक अनुमोदनों के अनुदान के प्रासंगिक समय पर 'एफआईपीबी'  के शीर्ष पर थे। उन्होंने अपराध में याचिकाकर्ता की कोई विशिष्ट और निश्चित भूमिका व्यक्त नहीं की। वरिष्ठ अधिकारियों में से किसी ने भी याचिकाकर्ता द्वारा प्रभावित करने या संपर्क करने का कोई भी दावा नहीं किया।

यह देखते हुए कि धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज किए गए बयानों से ई-मेल के विमर्श के साथ विभिन्न व्यक्तियों के बीच बातचीत हुई है, इसका यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कार्ति के चेस मैनेजमेंट सर्विसेज (सीएमएस) और एडवांटेज स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड (एएससी) के बीच गठजोड़ हुआ था।'सीएमएस' द्वारा दी गई कंसल्टेंसी सेवाओं के लिए एएससी की तरफ से पेशेवर शुल्क के रूप में 10 लाख रूपये के चालान के तौर पर उठाए जाने के तरीके के रूप में याचिकाकर्ता ने प्रशंसनीय स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

"हालांकि येअकेली घटना  इस चरण में  याचिकाकर्ता को जमानत ना  देने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि यह भुगतान रिकॉर्ड के लिए उचित रूप से दर्ज है और चेक द्वारा प्राप्त किया गया था। यह परीक्षण की बात है कि इस राशि का अंतिम लाभार्थी कौन था। न्यायमूर्ति गर्ग ने कहा, 'एएससी' के साथ याचिकाकर्ता के सटीक संबंध के बारे में रिकॉर्ड पर कोई विश्वसनीय सबूत साबित नहीं  गया है।


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