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सेक्स का अवैध व्यापार -मासूम लड़कियों को देह व्यापार में धकेलने का सुनियोजित अपराध जारी: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
22 March 2018 1:53 PM GMT
सेक्स का अवैध व्यापार -मासूम लड़कियों को देह व्यापार में धकेलने का सुनियोजित अपराध जारी: सुप्रीम कोर्ट
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कोर्ट में मौजूद पुलिस अधिकारी द्वारा यह बताने में नाकाम रहने पर कि पिछले साल 68 लड़कियां राजस्थान से महाराष्ट्र के वेश्याघरों में कैसे पहुँच गई, झुंझलाए सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सतीश को कोर्ट में तलब किया।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने संकेत दिया कि यह एक सुसंगठित अपराध है। पीठ ने कहा, “...बचाई गई सभी लड़कियां राजस्थान की हैं और ये सब की सब महाराष्ट्र में पाई गई हैं और ये सब मानवों को ज्ञात सर्वाधिक पुराने पेशे में लिप्त पाई गईं।

अगर किसी विशेष राज्य की 68 लड़कियां देश के किसी अन्य राज्य में मिलती हैं, और कथित रूप से वेश्यावृत्ति में लिप्त पाई जाती हैं, इससे संबंधित किसी भी व्यक्ति के मन में इसके बारे में शंका पैदा होनी चाहिए कि जरूर कोई व्यवस्थित अपराध चल रहा है जो निर्दोष लड़कियों को वेश्यावृत्ति में झोंक रहा है”।

इसके बाद बताया गया कि चकला घर चलाने वाली दो महिलाओं को गिरफ्तार किया गया पर उसके बाद उनको जमानत पर छोड़ा जा चुका है। अब तक हुई जांच से असंतुष्ट और झुंझलाए कोर्ट ने निर्देश दिया -

“अगर जांच इतनी सक्षमता से हो रही है तो जो अधिकारी कोर्ट में मौजूद हैं उनके हाथों में इसे छोड़ा जा सकता।

इस मामले का आयाम क्या है और इस सामाजिक समस्या के क्या निहितार्थ हैं उसको देखते हुए, हमें यह उपयुक्त लगता है कि महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को 4 अप्रैल 2018 को कोर्ट में उपस्थित रहने को कहा जाए ताकि वह कोर्ट को आगे की कार्रवाई में मदद कर सकें।”

इस तरह इस मामले की अगली सुनवाई अब 3 अप्रैल को होगी।

गत वर्ष जनवरी में आवेदनकर्ता एनजीओ की सूचना पर रेस्क्यू फाउंडेशन और पुलिस ने नंदुरबार के शाहदा स्थित वेश्यालय पर छापे मारे और सात लड़कियों को बरामद किया जिनमें से पांच नाबालिग थीं। इन नाबालिग लड़कियों को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर नंदुरबार के बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) में भेज दिया गया।

इसके बाद इसी क्षेत्र से 61 महिलाओं को सार्वजनिक स्थलों पर अशोभनीय व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और उन्हें महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 110 और 117 के तहत दोषी पाया गया। हालांकि, बाद में उन्हें पीड़ित माना गया और संरक्षण गृह में भेज दिया गया। इन 61 महिलाओं में से मेडिकल जांच के बाद 18 को नाबालिग बताया गया।

मजिस्ट्रेट ने इसके बाद आदेश दिया कि नाबालिगों को उनके माँ-बाप और रिश्तेदारों को सौंप दिया जाए। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 24 अगस्त को मजिस्ट्रेट के आदेश को निरस्त कर दिया और कहा कि मजिस्ट्रेट का आदेश इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956 और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 के अनुरूप नहीं था।

हाई कोर्ट ने कहा कि नाबालिगों को रिहा किए जाने का आदेश देकर मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण किया है और उन लोगों के दावे की जांच किए बिना इन लड़कियों को उन्हें सौंप दिया गया जिन्होंने उनके अभिभावक होने का दावा किया था।

इसके बाद जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो गत वर्ष सितम्बर में उसने कहा कि सीडब्ल्यूसी ने जल्दबाजी में लड़कियों को उनके तथाकथित माँ-बाप और अभिभावकों को सौंप दिया और याचिकाकर्ता एनजीओ को यह आशंका थी कि ये तथाकथित माँ-बाप वास्तव में इन लड़कियों की तस्करी और उनको अज्ञात लोगों को बेचने के लिए जिम्मेदार थे।

इसके बाद उसने दिसंबर 2017 में निर्देश दिया कि नाबालिग लड़कियों को उनके संरक्षण के बारे में हो रही जांच के पूरा होने तक याचिकाकर्ता एनजीओ के संरक्षण में दे दिया जाए।

 

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