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सुरक्षित ऋणदाता को चाहिए कि वह एसएआरएफएईएसआई अधिनियम की धारा 13 (3A) तहत ऋण लेने वालों के प्रतिनिधित्व पर गौर करे : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
20 March 2018 3:38 PM GMT
सुरक्षित ऋणदाता को चाहिए कि वह एसएआरएफएईएसआई अधिनियम की धारा 13 (3A) तहत ऋण लेने वालों के प्रतिनिधित्व पर गौर करे : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि गैर-निष्पादक आस्तियों (एनपीए) से सुरक्षित परिसंपत्तियों की प्राप्ति के क्रम में सुरक्षित ऋणदाताओं को चाहिए कि वह धारा 13(3A) के तहत ऋण लेने वालों के प्रतिनिधित्व पर हमेशा ही गौर करे। ऐसा उसे धारा 13 के तहत वित्तीय परिसम्पतीयों के प्रतिभूतिकरण और उनकी पुनर्संरचना और सिक्यूरिटी इंटरेस्ट एक्ट, 2002 के तहत इन्हें लागू करने के बाद किया जाना चाहिए।

अधिनियम की धारा 13 (3A) लेनदारों द्वारा देनदारों को नोटिस जारी करने के बाद आपत्ति उठाने का अधिकार देता है। इसके बाद लेनदारों से उम्मीद की जाती है कि वह इन आपत्तियों पर गौर करे और 15 दिनों के भीतर उनको उनके प्रश्नों का जवाब दे।

न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस स्थिति को भी बहुत रचनात्मक ढंग से संतुष्ट किया जा सकता है और लेनदार को चाहिए कि वह देनदार को सीधे जवाब न भेजे या उसको अस्वीकार न करे।

कोर्ट आईटीसी लिमिटेड की एक अपील पर सुनवाई कर रहा था जिसने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आईटीसी द्वारा सार्वजनिक निविदा द्वारा खरीदी गई एक परिसंपत्ति का फैसला ब्लू कोस्ट होटल्स के पक्ष में कर दिया था जो कि उसका देनदार था। इस मामले में लेनदार या क्रेडिटर भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आईएफसीआई) था।

ब्लू कोस्ट होटल्स ने आईएफसीआई के साथ 150 करोड़ रुपए के कॉर्पोरेट ऋण का समझौता फरवरी 2010 में किया था। यह ऋण जिन परिसंपत्तियों के खिलाफ लिए गए थे उनमें शामिल थी कृषि भूमि सहित ब्लू कोस्ट के होटलों की परिसंपत्ति। इस भूमि पर विला बनाया जाना था। ब्लू कोस्ट हालांकि ऋण की राशि समय पर नहीं चुका पाया और इसलिए उसके खाते को एनपीए घोषित कर दिया गया।

आईएफसीआई ने तब मार्च 2013 में अधिनियम की धारा 13(2) के अधीन एक नोटिस भेजकर ब्लू कोस्ट को 60 दिनों के भीतर बकाया राशि के भुगतान की बात कही। इसके जवाब में ब्लू कोस्ट ने मई 2013 को ज्यादा समय की मांग की। हालांकि, आईएफसीआई ने गिरवी रखी गई संपत्ति को जून 2013 में सांकेतिक रूप से अपने कब्जे में ले लिया और इस परिसंपत्ति की नीलामी के लिए एक नोटिस प्रकाशित करा दिया।

इसके बाद ब्लू कोस्ट जुलाई 2013 में ऋण वसूली अधिकरण (डीआरटी) की शरण में गया और उसको इस परिसंपत्ति के सांकेतिक अधिग्रहण के बदले इसके प्रतिभूतिकरण का प्रस्ताव दिया। इस मामले की सुनवाई डीआरटी और मजिस्ट्रेट के समक्ष हुई और इसके बाद यह गोवा और बॉम्बे के हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आईएफसीआई द्वारा ब्लू कोस्ट के प्रतिनिधित्व को नजरअंदाज करना अधिनियम की धारा 13(3A) का उल्लंघन है। अब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आईटीसी ने अपील की है जिसने आईएफसीआई द्वारा विज्ञापन दिए जाने के बाद इस परिसंपत्ति को खरीदा।

कोर्ट ने आईएफसीआई और आईटीसी के बीच किसी भी अरह की सांठगाँठ से इनकार किया और कहा कि देनदार को अनुच्छेद 226 और 136 के तहत विवेकाधीन समान राहत के दावे का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस आलोच्य फैसले को निरस्त कर दिया और ब्लू कोस्ट को आदेश दिया कि वह आईटीसी को इस गिरवी रखी परिसंपत्ति का कब्जा छह महीने के भीतर सौंप दे।


 
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