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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को रोहिंग्या शिविरों पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए

LiveLaw News Network
19 March 2018 1:30 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को रोहिंग्या शिविरों पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए
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दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में निर्वासित शिविरों में रहने वाले शरणार्थी रोहिंग्या  मुसलमानों के हालात को लेकर  2013 की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई  चंद्रचूड की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सोमवार को संबंधित सरकारों को दो सप्ताह के भीतर "तथ्यों और उचित निरीक्षण के आधार पर एक व्यापक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से उपस्थित वरिष्ठ वकील कॉलिन गोन्जाल्विस ने आग्रह किया, "पीआईएल 2013 के बाद से लंबित है। शिविर निवासी शौचालय और पीने के पानी के बिना रह रहे हैं ... बच्चे दस्त का शिकार हो रहे हैं ... स्कूल और अस्पताल भी इन लोगों को स्वीकार नहीं कर रहा है। "

उन्होंने जारी रखा,  "शिविरों की वीडियो रिकॉर्डिंग हैं .अदालत की जांच करने के लिए लोगों को भेज सकती है ... लोग गंदी परिस्थितियों में रह रहे हैं ... नालसा शिविरों का दौरा करें और देखे।  “

 अधिवक्ता माधवी दीवान ने जोर देकर कहा कि बेंच ने इसी तरह की याचिकाओं को मंजूर किया है और सोमवार को ही सुनवाई होनी है।

दरअसल वर्तमान रिट याचिका म्यांमार के निवासियों के जीवन और महिलाओं के स्वास्थ्य, परिवारों के स्वास्थ्य के अधिकार और  बुनियादी मानव जाति के अधिकार के गंभीर उल्लंघन से संबंधित है, जो उत्पीड़न, हिंसा और विस्थापन का सामना कर रहे हैं जो  कालिंदी कुंज, नई दिल्ली और सलेरी गांव, मेवात जिला, हरियाणा आदि में अस्थायी शिविरों में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। महिलाएं खराब हालात में बच्चों को जन्म दे रही हैं और अपने बच्चों के जीवन को ठीक तरह चलाने, भोजन कराने, शिक्षित करने या हासिल करने की कोई आशा नहीं रखती। इन शिविरों में लगभग 150 रोहिंग्या शरणार्थी परिवार हैं, जिनके लिए बुनियादी चिकित्सा देखभाल, मातृ स्वास्थ्य देखभाल, बाल चिकित्सा देखभाल  या साफ पानी, पौष्टिक भोजन या सुरक्षित आश्रयों के स्रोत नहीं हैं।

   याचिकाकर्ताओं ने शिविर निवासियों को दिल्ली और हरियाणा में जमीन पर रहने,  राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और शिशुओं की चिकित्सा देखभाल (पोषण और टीकाकरण सहित); दिल्ली में सरकारी मेडिकल कॉलेज, नूह, हरियाणा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्देश शिविर निवासियों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा प्रदान करने के लिए; और शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के अधिकार के अनुसार नजदीकी स्कूलों में बच्चों के नामांकन के लिए निर्देश समेत अन्य बातों के लिए प्रार्थना की है।

याचिकाकर्ताओं ने मानवाधिकार आयोग आंध्र प्रदेश (1996), उपभोक्ता शिक्षा और अनुसंधान केंद्र बनाम भारत संघ (1995) और पश्चिम बंगा खेत मजदूर समिति (1996) में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया है।

आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों के प्रावधानों, महिला के प्रति भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन और बाल अधिकारों पर सम्मेलनों का हवाला भी दिया है।

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