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पीएनबी धोखाधड़ी: NCLT ने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और 62 अन्य को संपत्ति बेचने पर रोक लगाई [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
6 March 2018 4:57 AM GMT
पीएनबी धोखाधड़ी: NCLT ने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और 62 अन्य को संपत्ति बेचने पर रोक लगाई [आर्डर पढ़े]
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 पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के साथ 12,600 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की चल रही जांच के बीच नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की मुंबई खंडपीठ ने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और दोनों हीरा डीलरों से जुडे 62 अन्य लोगों को निधि, परिसंपत्तियों और संपत्तियों के हस्तांतरण या उनका निपटान करने से रोक दिया है।   ऐसी  संस्थाओं और व्यक्तियों को सूचीबद्ध करते हुए, बीएसवी प्रकाश कुमार और वी नालासेनपति की एनसीएलटी खंडपीठ ने फैसला सुनाया, "कंपनी कानून अधिनियम, 2013 की धारा 221 और एलएलपी अधिनियम, 2008 की धारा 43 को लागू करके  उत्तरदायी, अन्य कंपनियों, एलएलपी, ट्रस्टों और व्यक्तियों को उपरोक्त वर्णित संस्थाओं और व्यक्तियों के धन, परिसंपत्तियों और संपत्तियों के हटाने, हस्तांतरण या निपटान पर  अगले आदेश तक रोक लगाई जाती है। "

ये एक पक्षीय आदेश कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा दायर एक याचिका पर पारित किया गया जिसमें उत्तरदायी संस्थाओं की  चल और अचल संपत्तियों का खुलासा करने और उन्हें  एमसीए को सौंपने की  मांग की गई थी।

 इसके अलावा उत्तरदायी को इन्हें गिरवी रखने, प्रभार या धारणाधिकार या तीसरे पक्ष के हित बनाने या किसी भी परिसंपत्ति को बेचने से रोक लगाने की मांग की गई ताकि सरकार अपना पैसा वापस ले सके।

 इसके अलावा बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) को गीतांजलि जेम्स की ट्रेडिंग प्रतिभूतियों पर रोक लगाने के निर्देश की मांग की गई, जो कि मोदी के मामा मेहुल चोकसी की अध्यक्षता में हैं।

यह भी प्रार्थना की गई कि सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विस लिमिटेड और नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड को प्रतिवादी की प्रतिभूतियों को फ्रीज करने का निर्देश दिया जाए।

एमसीए के प्रस्तुतीकरण का नोट लेते हुए, खंडपीठ ने कहा कि भले ही ट्रस्ट और व्यक्तियों को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 221 के तहत या सीमित दायित्व भागीदारी (एलएलपी) अधिनियम, 2008 की धारा 43 के तहत कवर नहीं किया गया है, तो एक निरोधक आदेश "बहुत आवश्यक" है चूंकि एमसीए ने स्पष्ट रूप से कहा है कि विभिन्न कंपनियों के माध्यम से धन को ट्रस्टों और व्यक्तियों को सौंप दिया गया है।

यह कहा गया, "याचिकाकर्ता ने कहा है कि चूंकि बैंक की निधि कंपनियों और एलएलपी के माध्यम से ट्रस्टों और व्यक्तियों को भेजी गई है, साथ ही कंपनियों और एलएलपी के खिलाफ आदेश की जांच के लिए प्रासंगिक होगी , जब अन्य संस्थाओं के खिलाफ जांच, इस खंडपीठ का जांच और पारित आदेश निरर्थक हो जाएगा, जब तक इन व्यक्तियों और ट्रस्टों के विरुद्ध रोक का आदेश पारित नहीं किया जाता है। "

 अब यह मामला 26 मार्च को सूचीबद्ध किया गया है जिसमें एमसीए को 15 दिनों के भीतर सभी उत्तरदाताओं को नोटिस देने का निर्देश दिया गया है।

अब तक की कहानी 

14 फरवरी को पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को सूचित किया था कि उसने मुंबई में अपनी ब्रैडी हाउस शाखा में 1.8 अरब डॉलर की "धोखाधड़ी और अनधिकृत लेनदेन" का पता लगाया था। यह पता चला था कि पीएनबी के अधिकारियों ने मोदी के साथ जुड़ी कंपनियों को अंडरटेकिंग पत्र सौंपे, जिससे उन्हें भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं से ऋण प्राप्त करने की अनुमति मिल गई। इनमें से कोई भी "धोखाधड़ी लेनदेन" बैंक के कोर बैंकिंग समाधान (सीबीएस) पर पंजीकृत नहीं था, जिससे किसी का ध्यान नहीं जा सका। बाद में यह पता चला कि बैंक के कर्मचारियों ने मोदी के साथ मिलकर ये काम किया था और धोखाधड़ी को सुलझाने के उनके अधिकारों का दुरुपयोग किया था। सीबीआई द्वारा की गई जांच के अलावा सुप्रीम कोर्ट भी दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है- एक वकील विनीत ढांडा द्वारा दायर और एक वकील मनोहर लाल शर्मा की याचिका है।

ढांडा की याचिका की मांग है कि वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को 10 करोड़ रुपये से अधिक ऋण देने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का निर्देश दिया जाए। धोखाधड़ी में शामिल सभी लोगों के खिलाफ मामलों के पंजीकरण के अलावा मोदी के "तत्काल प्रत्यार्पण" की मांग की गई है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि देश में खराब ऋणों के विवरणों का दस्तावेज बनाने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाई जानी चाहिए।  वास्तव में इसे “ भारत में बैंकिंग प्रणाली के इतिहास में सबसे बड़ा घोटाला" बताते हुए कहा गया है,  यह 2011 में शुरू हुआ और अधिकारियों की देखरेख में 6 साल की अवधि के लिए जारी रहा। इसलिए सीबीएस की दक्षता पर भी कई सवाल उठते हैं।

वहीं शर्मा की याचिका ने बैंकिंग धोखाधड़ी में न्यायालय की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग की है। यह जानकारी छिपाने के प्रयास संकेत देते है, "16 जनवरी को धोखाधड़ी के बारे में जानकारी होने के बावजूद पीएनबी ने इसे पुलिस या सीबीआई को नहीं बताया,बल्कि  बैंक के रिकॉर्ड / अन्य लिखित जानकारी को वित्त मंत्री के आदेश पर बदलने में व्यस्त रहा और केवल 29 जनवरी को सीबीआई मुंबई की शाखा में 7 बैंक कर्मचारियों के नाम पर एक शिकायत दर्ज कर तीन कंपनियों द्वारा 280.70 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया था। "


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