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कोर्ट के आदेशों को नहीं मानने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रतिदिन 1000 रुपए की दर से मामले के पक्षकार पर लगाया कुल 4.5 लाख का जुर्माना [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
5 March 2018 4:03 PM GMT
कोर्ट के आदेशों को नहीं मानने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रतिदिन 1000 रुपए की दर से मामले के पक्षकार पर लगाया कुल 4.5 लाख का जुर्माना [निर्णय पढ़ें]
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अपने आदेशों को नहीं माने जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने गत सप्ताह एक चैरिटेबल ट्रस्ट पर 4.5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।

जुर्माना लगाते हुए न्यायमूर्ति जीएस पटेल ने स्पष्ट किया कि अब विलंब और न्यायालय का आदेश नहीं मानने पर इसी तरह से निपटा जाएगा। उन्होंने कहा, “काफी लंबे समय से हम दिशानिर्देश जारी करते आ रहे हैं और ...विलंब को यह कहते हुए माफ़ कर देते रहे हैं कि यह ‘अंतिम मौक़ा’ है, और यह समझते रहे कि यह पर्याप्त होगा। पर जैसा कि स्पष्ट है, ऐसा नहीं है। आज हम जिस तरह का आदेश पास किए हैं वैसा आदेश देने के बाद ही गफलत करने वाला पक्ष आदेशों को मानने के लिए तत्पर होगा, और हम यह पहली बार देख रहे हैं कि कुछ सजगता आई है। पक्षकार और उनके एडवोकेट यह समझेंगे कि हमने फाइलिंग के लिए कोई सुझाव नहीं दिए हैं। यह कोर्ट का आदेश है। यह किसी पक्षकार को कोई विकल्प नहीं देता। इसको मानना आवश्यक है, वैकल्पिक नहीं”।

कोर्ट 2009 में दायर एक मामले की सुनवाई कर रहा है। हाल में हुई एक सुनवाई में न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि प्लैंटिफ ट्रस्ट को अपने गवाहियों की सूची, साक्ष्य का संग्रहण और हलफनामा 5 नवंबर 2016 को पेश करना था जो कोर्ट द्वारा इसकी समय सीमा में दो बार छूट देने के बाद भी वह समय पर नहीं पेश कर पाया। और तो और, ट्रस्ट ने कोर्ट के आदेश के पालन के लिए एक सप्ताह का और समय माँगा था।

प्रतिवादी ने इसका विरोध किया और कहा कि कोर्ट का आदेश नहीं मानने के कोई वैध कारण नहीं हैं और कहा कि वादी पर आदेशों को नहीं मानने के लिए शर्त लगाई जाए। इस दलील को मानते हुए कोर्ट ने ट्रस्ट पर प्रतिदिन 1000 रुपए के हिसाब से 25 नवंबर 2016 से कुल 450 दिन पर जुर्माना लगाया।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह का जुर्माना के निर्धारण के दौरान जुर्माने की राशि इतनी कम नहीं होनी चाहिए कि पूरा मामला ही अर्थहीन हो जाए। उन्होंने कहा : मैं नहीं समझता कि आज के समय में और इस शहर में 100 रुपए प्रतिदिन का जुर्माना अनुचित है। इससे कम की राशि का कोई अर्थ नहीं है और अब वो दिन गए जब कोर्ट 5000 या 25000 का जुर्माना लगाया करता था यह ध्यान में रखे बिना कि विलंब की अवधि कुल कितनी है।

इसके बाद उन्होंने ट्रस्ट को निर्देश दिया कि वह यह राशि 7 मार्च तक रजिस्ट्री में जमा करा दे।

आश्चर्य की बात है कि ट्रस्ट ने उस दिन भी 3 बजे कोर्ट से इस जुर्माने में कमी करने का आग्रह किया जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया.


 
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