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जल्दबाजी का न्याय, न्याय को दफन करता है: दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल जज की सुपर फास्ट प्रक्रिया पर उठाया सवाल [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
27 Feb 2018 2:49 PM GMT
जल्दबाजी का न्याय, न्याय को दफन करता है: दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल जज की सुपर फास्ट प्रक्रिया पर उठाया सवाल [निर्णय पढ़ें]
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सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 साल के एक लड़के के साथ अप्राकृतिक यौनाचार के बाद  हत्या जैसे गंभीर अपराध के आरोपों को लेकर जल्दबाजी में मुकदमा चलाने के लिए ट्रायल कोर्ट जज पर कडी टिप्पणियां की।

 यह देखते हुए कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) ने एक दिन में बड़ी संख्या में अभियोजन पक्ष के गवाहों की परीक्षा की अनुमति दी थी, न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और न्यायमूर्ति  आईएस  मेहता ने कहा, "अदालत ने अपीलकर्ताओं के लिए वकील की दलील में योग्यता पाई है कि अभियुक्त के लिए ट्रायल जज द्वारा अपनाई गई उपरोक्त 'सुपर-फास्ट' ट्रैक प्रक्रिया गहरे पूर्वाग्रह का कारण बनी।

कोर्ट ये समझने में नाकाम रहा है कि ट्रायल जज ने इस प्रकृति के अपराध के मामले में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के साथ इतनी तेजी क्यों दिखाई  और कैसे वह यह महसूस करने में नाकाम रही कि इससे न्याय की गंभीर विफलता होगी। जल्दबाजी का न्याय, न्याय को दफन करता है।"

कोर्ट एएसजे द्वारा अक्टूबर 2014 में पारित आदेश को चुनौती देने वाली दो अपीलों पर सुनवाई कर रहा था जिसमें आरोपी को 14 साल के लड़के के अपहरण, हत्या और अप्राकृतिक यौनाचार  के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

मामले की जांच करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने कुल 24 गवाहों की जांच की थी, उनमें से 22 गवाहों का परीक्षण पहले दिन ही कर दिया गया। न्यायालय ने एक दिन में कई गवाहों की जांच के लिए ट्रायल कोर्ट के कदम को खारिज करते हुए कहा, "शुरू में, अदालत यह मानने के लिए बाध्य हुई है कि एएसजे जिसने इस मामले का ट्रायल चलाया और फैसला दिया, उसने ऐसा पहली बार नहीं किया है। ट्रायल प्रक्रिया को गति देने के लिए उत्साह में एक ही दिन में एक बड़ी संख्या में अभियोजन पक्ष के गवाह (पीडब्ल्यूएस) की जांच करके गंभीर त्रुटि का ये एक और मामला है।”

कोर्ट ने तब कहा कि ऐसे मामलों में एक ही न्यायाधीश का नाम पहले भी आ चुका है  जिसमें उन्होंने इस तरह के मुकदमे में इसी  तरह से ट्रायल चलाया था और इस तरह के मामलों में गंभीर प्रकृति के आरोपों के बावजूद पूरे अभियोजन पक्ष के सबूत की प्रस्तुति के लिए एक ही तारीख तय की। यह देखा गया कि इस तरह का ट्रायल बचाव पक्ष को तैयारी के लिए अपेक्षित समय से वंचित करना है।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट को इस दौरान पर्याप्त वक्त देने की सलाह देते हुए कहा, " हालांकि सीआरपीसी में जनादेश दिन-प्रतिदिन परीक्षण करने के लिए है, लेकिन यह एक चरम प्रस्ताव होगा कि गंभीर अभियोगों से जुड़े ऐसे मामलों में एक दिन में ही पूरे अभियोजन पक्ष के सबूत दर्ज किए जाते हैं। जबकि ट्रायल कोर्ट को बचाव पक्ष के मुकदमेबाजी को अनावश्यक रूप से स्थगित करने और गवाहों को जीतने के  हथकंडों से सतर्क रहने की जरूरत होती है।

वहीं एक ही दिन में पूरे अभियोजन पक्ष के साक्ष्य के लिए 22 गवाहों को दर्ज करना कुछ ज्यादा ही तेज प्रतिक्रिया है।

 ऐसे मामले में जहां प्रतिवादियों को उन आरोपों का सामना करना पड़ता है जो मौत की सजा के साथ दंडनीय होते हैं और विशेष रूप से जहां कानूनी सहायता वकील द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है,  ट्रायल कोर्ट को को कुछ सावधानी बरतनी चाहिए।

यह सुनिश्चित करने के लिए संयम भी करना चाहिए कि वकील को जिरह के लिए तैयारी करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।  यह एहसास होना चाहिए कि आरोपी की ओर से पेश वकील को किसी गवाह से विशिष्ट सवाल पूछने से पहले आरोपी से परामर्श करना पड़ सकता है। इसके लिए  कुछ समय और गोपनीयता की आवश्यकता है और न्यायाधीश के सामने अदालत के कमरे में ये होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। "

न्यायालय ने हालांकि चेतावनी दी कि एक दिन में कितने गवाहों की जांच होनी चाहिए यह निर्णय करते समय केस की प्रकृति को देखना चाहिए।

इसके बाद कोर्ट ने घटना की श्रृंखला की छानबीन की और मृतक के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा, "गौरतलब है कि मलाशय और जननांग अंगों के संबंध में कोई असामान्यता नहीं मिली और चिकित्सा प्रमाण ने ट्रायल कोर्ट के  निष्कर्ष का समर्थन नहीं किया कि मृतक के साथ जबरन यौनाचार किया गया या यहां तक ​​कि प्रयास भी किया गया। इसलिए जबकि चिकित्सा सबूत में मौत का कारण गला घोंटना बताया गया तो आईपीसी की धारा 377 के लिए ये नकारात्मक सबूत था।"

इसके बाद अदालत ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष दूसरे आरोपों के मामले में भी आरोप साबित करने में असफल रहा है।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि हालात को लेकर कडियां अधूरी हैं और इनसे साबित नहीं होता कि आरोपी ने अपराध किया है।  यह बताता है कि संदेह कितना भी सशक्त क्यों ना हो, ये अपराध साबित नहीं कर सकता।

 इसके बाद यह कहा गया कि " ट्रायल जज द्वारा मुकदमे चलाने के तरीके के रूप में न्याय की विफलता हुई है।” इसके बाद ट्रायल जज के आदेश को पलट दिया गया और आरोपी को तत्काल रिहा करने के निर्देश जारी किए गए।


 
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