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सुप्रीम कोर्ट ने UPPSC 2004 परीक्षा में स्केलिंग पद्धति को ‘मनमाना’ करार दिया,लेकिन नियुक्तियों से छेड़छाड़ से इनकार किया [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
23 Feb 2018 10:20 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने UPPSC 2004 परीक्षा में स्केलिंग पद्धति को ‘मनमाना’ करार दिया,लेकिन नियुक्तियों से छेड़छाड़ से इनकार किया [निर्णय पढ़ें]
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  सुप्रीम कोर्ट ने प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) परीक्षा, 2004 औरबैकलॉग परीक्षा, 2004  में उम्मीदवारों को अंक देने के लिए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) द्वारा अपनाई गई स्केलिंग पद्धति को  "मनमाना" घोषित किया है और कहा कि परीक्षाओं में इसने नियुक्तियों को प्रभावित किया।

न्यायमूर्ति एस ए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा कि यूपीपीएससी ने अनिवार्य और वैकल्पिक दोनों विषयों के लिए स्केलिंग पद्धति को अपनाने में चूक की थी, जबकि वह केवल वैकल्पिक विषयों के लिए इस विधि का इस्तेमाल कर सकता था।

 यूपीपीएससी द्वारा दायर की गई अपील का फैसला करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को

इस हद तक बरकरार रखा कि 2004 की परीक्षाओं में अनिवार्य विषयों के लिए स्केलिंग पद्धति स्वैच्छिक थी, लेकिन परीक्षा के परिणामों को नए सिरे से घोषित करने के निर्देश नहीं दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के अपने पूर्व के फैसले पर भरोसा किया जिसमें संजय सिंह और अन्य बनाम यूपी लोक सेवा आयोग, इलाहाबाद और अन्य (2007) मामले में  यूपी राज्य में सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) के पदों पर भर्ती करने को चुनौती दी गई थी। उस मामले में परीक्षाएं 2003 में आयोजित की गईं।

सर्वोच्च न्यायालय ने तब  सोचा था कि परीक्षक की  परिवर्तनशीलता को अलग  करने के लिए उचित उपाय होना चाहिए  और स्केलिंग की प्रक्रिया का वहां पालन किया जा सकता है जहां उम्मीदवार तीन अलग-अलग वैकल्पिक विषयों को लेते हैं।

संजय सिंह के मामले का जिक्र करते हुए, न्यायमूर्ति बोबडे और न्यायमूर्ति राव की पीठ ने कहा, " स्केलिंग की प्रक्रिया विभिन्न विषयों में परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए एक मान्यताप्राप्त विधि है। जब परीक्षा में बड़ी संख्या में उम्मीदवारों के पेपर का मूल्यांकन करने वाले कई परीक्षार्थी हैं, तो 'परीक्षक व्यक्तिपरकता' या 'परीक्षक परिवर्तनशीलता' की संभावना है। परीक्षक परिवर्तनशीलता को कम करने के लिए, संजय सिंह के मामले में इस अदालत में यह कहा गया कि मॉडरेशन इसके लिए सबसे अच्छा तरीका होगा। "

"पीसीएस परीक्षा, 2004 और बैकलॉग परीक्षा, 2004 में उम्मीदवारों को मुख्य लिखित परीक्षाओं में भाग लेना था जिसमें चार अनिवार्य विषयों और दो वैकल्पिक विषय शामिल थे। अनिवार्य विषय सभी उम्मीदवारों के लिए आम थे और दो वैकल्पिक विषयों को उपलब्ध विषयों में से चुना जाना था, जैसा कि विज्ञापनों में बताया गया। संजय सिंह के मामले में इस न्यायालय के फैसले के अनुसार आयोग केवल वैकल्पिक विषयों के लिए स्केलिंग पद्धति का पालन कर सकता था, अनिवार्य विषयों के लिए नहीं। हालांकि  उच्च न्यायालय में अपीलकर्ता (यूपीपीसीएस) की ओर से दी गई दलील से यह स्पष्ट है कि अनिवार्य विषयों के लिए स्केलिंग पद्धति का भी पालन किया गया था। हम उच्च न्यायालय के निष्कर्षों को स्वीकार करते हैं कि पी.सी.एस. और बैकलॉग भर्ती परीक्षाएं, 2004 संजय सिंह के मामले में इस अदालत के फैसले के विपरीत थीं, " बेंच ने कहा।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2004 की परीक्षा में किए गए चयन और नियुक्तियों से छेडछाड करने में उत्सुकता नहीं दिखाई।

 पीठ ने कहा, "हालांकि हम उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से सहमत हैं कि संजय सिंह के मामले में दिए गए सिद्धांतों के अनुसार परीक्षाएं आयोजित नहीं की गईं लेकिन हम नतीजों को नए सिरे से अंतिम रूप देने के  निर्देशों को स्वीकार नहीं करते।

उक्त निर्देशों के अनुसार की जाने वाली प्रक्रिया इस अदालत में गैरमौजूद कई चयनित उम्मीदवारों के विस्थापन और योग्यता सूची में बदलाव करने के साथ-साथ पिछले दस वर्षों में नियुक्त और काम करने वालों के साथ गंभीर पूर्वाग्रह का कारण होगी। इसलिए हम इस राय से हैं कि 'पीसीएस' और बैकलॉग 'पदों के लिए 2004 के विज्ञापन के अनुसार नियुक्तियों से छेडछाड नहीं की जानी चाहिए। "

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय यूपीपीसीएस द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2007 के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें स्केलिंग पद्धति के कारण मेधावी उम्मीदवारों के वास्तविक अंकों में कमी की शिकायत की गई थी।

गौरतलब है कि यूपीपीएससी ने फरवरी 2014 में एक विज्ञापन जारी किया था जिसमें  राज्य / ऊपरी अधीनस्थ संयुक्त

सेवाओं के तहत पदों की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। परिणाम 2006 में घोषित किए गए थे। मई 2004 में आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के बैकलॉग पदों में आवेदन करने के लिए एक अन्य विज्ञापन जारी किया गया और अंतिम परिणाम मार्च 2007 में घोषित किए गए।

  उच्च न्यायालय में उपरोक्त दो परीक्षाओं के परिणामों की घोषणा को चुनौती दी गई , मुख्य रूप से इस आधार पर कि यूपीपीएससी द्वारा उम्मीदवारों को अंक देने में स्केलिंग पद्धति गैरकानूनी, मनमानी और तर्कहीन थी। उत्तरदाताओं के अनुसार, आयोग द्वारा अपनाई गई स्केलिंग पद्धति के कारण उनके वास्तविक अंक कम हो गए थे।


 
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