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[आधार सुनवाई: 12वां दिन सत्र -2] :अधिनियम सिर्फ बायोमेट्रिक डाटा को अपडेट करने का विकल्प देता है, पर किसी को यह कब पता चलेगा कि उसको अपना बायोमेट्रिक अपडेट करना है?

LiveLaw News Network
22 Feb 2018 5:44 AM GMT
[आधार सुनवाई: 12वां दिन सत्र -2] :अधिनियम सिर्फ बायोमेट्रिक डाटा को अपडेट करने का विकल्प देता है, पर किसी को यह कब पता चलेगा कि उसको अपना बायोमेट्रिक अपडेट करना है?
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भोजनावकाश के बाद जब आधार की सुनवाई दुबारा शुरू हुई तो वरिष्ठ एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने न्यायमूर्ति केएस पुत्तस्वामी फैसले में निज के बारे में सूचना को फ़ैलाने से रोकने और सूचना का किस हद तक प्रयोग किया जा सकता है इस पर नियंत्रण की चर्चा की।

 “आधार अधिनियम और उसके तहत विनियमन के जो प्रावधान किए गए हैं उसके तहत मेटाडाटा सहित एक सर्वव्यापी डाटावैलेंस व्यवस्था की कल्पना की गई है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है”, उन्होंने कहा।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने रिचर्ड ए पोस्नर के आलेख का भी जिक्र किया जिसमें उसने कहा था कि “निजता आतंकवादी का सबसे अच्छा दोस्त होता है, और आतंकवादी की निजता को उसी तकनीक विकास ने बढ़ाया है जिसने डाटा माइनिंग को आसान बना दिया है और निर्दोष लोगों से भारी मात्रा में निजी सूचनाएं एकत्र की हैं :: इंटरनेट और डिजिटल डाटा का सुरक्षित एनक्रिप्शन जो अनभिज्ञता के साथ मिलकर इंटरनेट को षड्यंत्र का एक शक्तिशाली औजार बना देता है। सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए डिजिटाईजेशन का लाभ उठाने की बाध्यता है...”

सुब्रमण्यम ने कहा, “यह बहुत अलग है। सरकार के लिए यह उचित नहीं है कि वह समस्त नागरिकों पर ऐसे नजर रखे जैसे सभी आतंकवादी हों”।

इसके बाद उन्होंने आधार अधिनियम की धारा 59 का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “किसी मौलिक अधिकार पर पाबंदी सिर्फ वर्तमान में हो सकता है इसे पिछले प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता”।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, “अगर कोई क़ानून नहीं है तो उसको बनाया जा सकता है। लेकिन जब एक बार इसको तोड़ने का क्रम शुरू हो जाता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि इसको पहले नहीं तोड़ा गया है”। न्यायमूर्ति एके सिकरी ने इससे सहमति जताई।

सुब्रमण्यम ने कहा, “अगर किसी कानूनी अथॉरिटी के बिना कोई कार्रवाई की गई तो पिछले प्रभाव से इसको उपयुक्त अथॉरिटी नहीं दिया जा सकता”।

आधार अधिनियम की धारा 57 के बारे में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या राज्य सरकारों ने आधार का प्रयोग इस अधिनियम के लागू होने के पहले किया है। सुब्रमण्यम ने कहा कि राज्य सरकारों ने एमओयू किया है ताकि वे स्टेट रेजिडेंट डाटा हब बना सकें।

सुब्रमण्यम ने कहा, “नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ आधार के सफल सत्यापन पर निर्भर करता है। अगर सत्यापन विफल रहता है तो उनको राहत का कोई रास्ता नहीं है, न ही तात्विक और न ही प्रक्रियात्मक। यह अधिनियम सिर्फ बायोमेट्रिक डाटा को अपडेट करने का विकल्प देता है। पर किसी व्यक्ति को यह कब पता चलेगा कि उसको अपना बायोमेट्रिक अपडेट करना है?”

यह सुनवाई वृहस्पतिवार को जारी रहेगा।

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