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अपीलीय अधिकारी द्वारा सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत निवासियों के निर्वासन) अधिनियम, 1971 के तहत आदेश व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि बतौर सिविल कोर्ट : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
21 Feb 2018 11:48 AM GMT
अपीलीय अधिकारी द्वारा सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत निवासियों के निर्वासन) अधिनियम, 1971 के तहत आदेश व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि बतौर सिविल कोर्ट : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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 सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम  नंदिनी जे शाह और अन्य मेंयह माना है कि सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत निवासियों के निष्कासन) अधिनियम, 1971 की धारा 9 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए अपीलीय अधिकारी एक व्यक्ति विशेष  के रूप में कार्य नहीं करता बल्कि सिविल कोर्ट की क्षमता में कार्य करता है।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह मुद्दा था कि क्या बॉम्बे हाई कोर्ट एक रिट याचिका (भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दायर की गई) में एक न्यायाधीश के निर्णय के खिलाफ  उत्तरदाताओं द्वारा दाखिल पत्रों की पेटेंट अपील सुनवाई योग्य है ?

अधिनियम के तहत अपीलीय अधिकारी के निर्णय की शुद्धता और वैधता पर सवाल उठाए गए थे।

भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जिला न्यायपालिका का हिस्सा बनने पर न्यायाधीश एक अदालत के तौर पर काम करते हैं और उनके द्वारा दिए गए आदेश अधीनस्थ अदालत के आदेश होंगे जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उपाय किया जाएगा। खंडपीठ को एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ पेटेंट अपील पत्रों को स्वीकार नहीं कर करना चाहिए था।

विभिन्न फैसलों का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा: "धारा 9 (1) का जोर जिला न्यायाधीश के समक्ष एस्टेट अधिकारी के आदेश के खिलाफ अपील के उपाय प्रदान करना है, जो निर्विवाद रूप से पूर्व मौजूदा प्राधिकरण है और जिले के भीतर न्यायपालिका, अपील दर्ज करने में देरी को निरुपित करने और अपील की अवधि के दौरान अंतरिम राहत देने सहित राज्य की सारी न्यायिक शक्ति का निर्वहन करती है। हालांकि एक अपीलीय अधिकारी के रूप में वर्णित, जिला न्यायाधीश, धारा 9 के तहत अपील का निर्णय करने के लिए और नागरिक अदालत की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। "

अदालत ने कहा कि जब अपीलीय अधिकारी या तो जिले का जिला न्यायाधीश होता है या उस जिले के किसी अन्य  जरूरी योग्यता रखने वाले न्यायिक अधिकारी को जिला न्यायाधीश द्वारा नामित किया जा सकता है। जिला न्यायाधीश या नामित जज में अपीलीय प्राधिकारी की शक्ति को किसा भी तरह व्यक्ति विशेष का रंग नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने यह भी दोहराया कि एक सिविल कोर्ट द्वारा पारित किया गए आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत,  जो कि संविधान के अनुच्छेद 226 से भिन्न है, सुनवाई कर सकता है लेकिन रिट के जरिए कोई आदेश जारी नहीं कर सकता। इसलिए सिविल कोर्ट के आदेश पर  कोई पत्र पेटेंट अपील उचित नहीं होगी।


 
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