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जानिए क्या है कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

LiveLaw News Network
19 Feb 2018 11:39 AM GMT
जानिए क्या है कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य नायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और अमिताभ रॉय की पीठ ने शुक्रवार को कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के अंतिम फैसले के खिलाफ की गई अपील पर अपना फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने यह फैसला 5 फरवरी 2007 को सुनाया था और अब इसके लगभग 11 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह फैसला दिया है। लाइव लॉ यहाँ इस फैसले से संबंधित कुछ ऐसे प्रश्नों के उत्तर दे रहा है जो पाठकों के मन में उठ सकता है।

प्रश्न : तो क्या इस फैसले के आने के बाद अब अंतर्राज्यीय जल-विवाद समाप्त हो जाएगा?

उत्तर : इस फैसले से ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ इस मुख्य विवाद का सुप्रीम कोर्ट में अंत हो गया है। अब अगर कोई एक पक्ष इस फैसले को नहीं मानता है तो यह न्यायालय की अवमानना होगी और दोनों ही पक्ष दुबारा इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं।

प्र. : पर क्या दोनों ही राज्य सरकारें इस फैसले से संतुष्ट हैं?

 :  हाँ। कर्नाटक इसलिए खुश है क्योंकि उसे तमिलनाडु को आवश्यक रूप से जितना पानी छोड़ना पड़ता था, उसे 192 टीएमसीएफटी से कम कर 177.25 टीएमसीएफटी कर दिया गया है। इसके अलावा, 4.75 टीएमसीएफटी पानी बेंगुलुरु में पेय जल उपलब्ध कराने के लिए प्रयुक्त होगा जबकि 10 टीएमसीएफटी जल का प्रयोग औद्योगिक एवं अन्य प्रयोगों के लिए होगा।

तमिलनाडु निराश है, क्योंकि उसकी साझेदारी कम कर दी गई है। पर कोर्ट ने पानी छोड़ने का एक पूरा कार्यक्रम निर्धारित कर दिया है जो कि राज्य के लिए सुखद है। कोर्ट का यह कहना कि अंतर्राज्यीय नदियाँ राष्ट्रीय परिसंपत्ति है और यह किसी राज्य विशेष का नहीं है, तमिलनाडु के पक्ष में जाता है।

प्र.: तो क्या मुख्य नायाधीश इस बात का श्रेय ले सकते हैं कि उन्होंने सौ वर्ष पुराने विवाद को सुलझा दिया है? ऐसा वो कैसे कर पाए?

:  अभी यह नहीं कहा जा सकता कि मुख्य न्यायाधीश ने मामले को शान्तिपूर्वक सुलझा लिया है क्योंकि तमिलनाडु में कई धड़े अब इस फैसले पर निराशा जाहिर करने लगे हैं और अपनी सरकार पर अक्षमता का आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि उसने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कुछ ज्यादा नही किया। पर तमिलनाडु की पैरवी वरिष्ठ एडवोकेट शेखर नफाड़े और राकेश द्विवेदी ने किया। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि कर्नाटक इस फैसले को कितना मानता है। अगर कर्नाटक ने फैसले के अनुरूप पानी नहीं छोड़ा तो इस पर फिर विवाद उत्पन्न हो जाएगा।

प्र. : तमिलनाडु को कम पानी दिए जाने के बारे में फैसले में क्या दलील दी गई है?

: कोर्ट ने, ऐसा लगता है कि, कर्नाटक के वकील श्याम दीवान की दलील पर ज्यादा भरोसा किया जिन्होंने कहा कि भूमिगत जल रिन्यूएबल होता है और अगर इसको नियमित रूप से नहीं निकाला गया तो यह भूमि की जलशोषण क्षमता कम कर देंगे और उस स्थिति में वर्षा का पानी जमीन के अंदर ज्यादा अवशोषित नहीं हो पाएगा और वह बहकर नष्ट हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने भूमिगत जल की दलील को अस्वीकार करने के क्रम में बड़े तटीय क्षेत्र को नजरअंदाज कर दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने तमिलनाडु का पानी का कोटा कम नहीं करके गलती की थी जबकि उसने यह माना था कि तमिलनाडु के पास 20 टीएमसी भूमिगत जल उपलब्ध है। तमिलनाडु में सिंचाई के लिए जल की इस तरह की उपलब्धता को ध्यान में रखना चाहिए था।

नफाड़े ने जो दलील दी वह दीवान की दलील को ख़ारिज किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। उन्होंने कहा कि भूमिगत जल को अतिरक्त जल संसाधन नहीं माना जा सकता क्योंकि वह सतह पर उपलब्ध पानी से ही दुबारा भरता है जो कि वर्षा सहित कई बातों पर निर्भर करता है। सालों भर भूमिगत जल का स्तर स्थाई नहीं होता और कर्नाटक की जल परियोजना के कारण इसमें और कमी आ गई है।

कोर्ट ने इस पर केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड, जल संसाधन मंत्रालय, सिंचाई आयोग, 1972 और यूएनडीपी कार्यक्रम का हवाला दिया यह बताने के लिए कि तमिलनाडु में भरपाई होने लायक भूमिगत जल स्रोत मौजूद हैं।  पीठ ने यह भी कहा कि तमिलनाडु ने कहा है कि पुरानी डेल्टा में 30 टीएमसी भूमिगत जल के उपयोग के अवसर मौजूद हैं। कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि तमिलनाडु के पास 20 टीएमसी तक भूमिगत जल उपलब्ध है और यह पानी कावेरी जल पर निर्भर नहीं है और इस तरह इसे उपलब्ध भंडार माना जा सकता है। पीठ ने तमिलनाडु का जल कोटा घटाए जाने को इसलिए भी उचित ठहराया कि तमिलनाडु ने खुद स्वीकार किया है कि उसके पास 30/47 टीएमसी  भूमिजल उपलब्ध है।  इसलिए पीठ ने कहा कि तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्र में उपलब्ध 10 टीएमसी भूमिजल की उपलब्धता को स्वीकार किया जा सकता है और अंतिम फैसले में इस आधार पर जल बंटवारे का निर्धारण हो सकता है।

प्र: जल की हिस्सेदारी पर ट्रिब्यूनल के फैसले की आलोचना की गई थी। क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह साबित किया है?

उ: नहीं। यह सिर्फ ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष को ही ध्वनित करता है कि अगर कावेरी बेसिन में किसी साल पानी कम होता है तो केरल, कर्नाटक, तमिनाडु और केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी को मिलने वाले पानी में कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड आनुपातिक कमी करेगा। वैसे भी, संकट के समय में जल की साझेदारी का फ़ॉर्मूला काफी जटिल होता है और सुनवाई के दौरान कोर्ट इसका समाधान नहीं कर सकता।

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