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सिर्फ इस आरोप पर कि नो-क्लेम प्रमाणपत्र वित्तीय दबाव से और डरा-धमकाकर प्राप्त किया गया, मामला पंचाट में जाने लायक नहीं बन जाता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
16 Feb 2018 10:43 AM GMT
सिर्फ इस आरोप पर कि नो-क्लेम प्रमाणपत्र वित्तीय दबाव से और  डरा-धमकाकर प्राप्त किया गया, मामला पंचाट में जाने लायक नहीं बन जाता : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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हाई कोर्ट की मध्यस्थता के एक उल्लेख को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों को करार की पूर्ण और अंतिम राशि मिल जाने के बाद मध्यस्थता के मुद्दे को उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस आरोप से कि नो-क्लेम प्रमाणपत्र वित्तीय दबाव और डरा-धमकाकर प्राप्त किया गया, और इसके अलावा और कोई बात नहीं है, तो इतने भर से मामला पंचाट में जाने लायक नहीं हो जाता।

यह विवाद ओएनजीसी द्वारा दिए गए एक ठेके से पैदा हुआ। जिस कंपनी ने यह ठेका दिया उसने काम पूरा होने पर अंतिम भुगतान मिलने के बाद नो-क्लेम प्रमाणपत्र जारी किया। हालांकि, बाद में इस नो-क्लेम प्रमाणपत्र को उसने यह कहते हुए वापस ले लिया कि यह प्रमाणपत्र दबाव में और डरा-धमकाकर जारी किया गया ताकि भुगतान प्राप्त हो सके। कम्पनी ने कहा कि उसके कई बिल क्लीयर नहीं हुए और उसको ओएनजीसी की वजह से और बहुत अतिरिक्त खर्च करने पड़े। इसलिए कंपनी ने पंचाट का रुख किया। ओएनजीसी द्वारा मध्यस्थता के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने के बाद कंपनी ने हाई कोर्ट में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने इस मामले को मध्यस्थता के लिए स्वीकार कर लिया।

ओएनजीसी ने हाई कोर्ट के मंतव्यों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और कहा कि पार्टी द्वारा ठेके के निष्पादन पर संतोष जताने के बाद मध्यस्थता की कार्रवाई की अनुमति हाई कोर्ट को नहीं देनी चाहिए थी।

ऐसी स्थिति में जब कोई पक्ष ठेके के निष्पादन पर असंतोष जताना और डराने-धमकाने और फ्रॉड की बात कह कर इसके विवादित होने की बात कहना जैसी बात से पहले भी क़ानून निपटता रहा है। भारत संघ एवं अन्य बनाम मास्टर कंस्ट्रक्शन कंपनी (2011) 12 SCC 349 और न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम जीनस पॉवर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (2015) 2 SCC 424 मामलों में इस तरह की स्थिति से निपटा गया है। इन मामलों में कहा गया कि कई बार इस तरह के कुछ वास्तविक मामले आते हैं जब विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है और मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा जाता है। पर फ्रॉड, डराना-धमकाना और दबाव डालने जैसे आरोप लगाना इसके लिए पर्याप्त नहीं होते। आरएल कलाथिया एवं कंपनी बनाम गुजरात राज्य  (2011) 2 SCC 400 मामले में यह कहा गया कि अमूमन सरकारी कम्पनियों का हाथ ऊपर होता है और वे भुगतान के लिए ‘कोई बकाया नहीं’ जैसे प्रमाणपत्र देने की मांग करते हैं।

इस तरह के मामलों में पहले आए फैसलों की चर्चा करने के बाद न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय की पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में पार्टी यह सिद्ध करने में विफल रही है कि किसी तरह का फ्रॉड या दबाव डालने जैसी कोई बात हुई है और जो कहा गया है वह विश्वसनीय नहीं है और इसलिए कोर्ट इस मामले को मध्यस्थता के लिए नहीं भेज सकता।

कोर्ट ने पाया कि कंपनी ने जो विवाद खड़ा किया है वह वास्तविक नहीं है। पार्टियों के बीच हुए पत्रव्यवहार को देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि कंपनी ने पहले इस तरह का मुद्दा कभी नहीं उठाया था। कंपनी ने खुद ही ‘नो-क्लेम प्रमाणपत्र’ दिया था। उसने प्राप्त राशि को स्वीकार किया था और ठेके के पूरा हो जाने की बात खुद ही मानी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त बातों पर गौर करने के बाद कहा कि हाई कोर्ट को इस मामले को पंचाट को नहीं भेजना चाहिए था।


 
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