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सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोपी तीन लोगों को जमानत देने के समय बॉम्बे हाई कोर्ट के बयान से असहमति जताई; आरोपियों से जमानत के लिए दुबारा बॉम्बे हाई कोर्ट में पेश होने को कहा [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
15 Feb 2018 11:38 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोपी तीन लोगों को जमानत देने के समय बॉम्बे हाई कोर्ट के बयान से असहमति जताई; आरोपियों से जमानत के लिए दुबारा बॉम्बे हाई कोर्ट में पेश होने को कहा [आर्डर पढ़े]
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने जनवरी 2017 में तीन लोगों को जमानत देते हुए जो आदेश दिया था उसकी उस समय काफी आलोचना हुई थी क्योंकि उसमें धार्मिक घृणा के आधार पर किसी हत्या की नींदा की गई थी। यह मामला है पुणे में तीन लोगों द्वारा शेख मोहसिन की 2 जून 2014 को हत्या की। इनको जमानत देते हुए हाई कोर्ट ने कहा था :

“मृतक का दोष सिर्फ इतना था कि वह किसी और धर्म का था। मैं यह मानता हूँ कि यह बात आरोपी/आवेदनकर्ता के पक्ष में जाता है”।

इसके अलावा, आवेदक/आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है और यह लगता है कि धर्म के नाम पर उनको उकसाया गया और उन्होंने यह हत्या की।”

ऐसा माना जाता है कि आरोपियों को इस हत्या को अंजाम दने के लिए दिमागी तौर पर उकसाया गया था क्योंकि ये लोग इस घटना के आधा घंटा पहले हिंदू राष्ट्र सेना नामक एक संगठन की बैठक में शामिल हुए थे। अभियोजन पक्ष के मत के अनुसार, मृतक पेस्टल ग्रीन रंग का कमीज पहने हुए था, उसकी दाढी थी और इसीलिए आरोपी और सह-आरोपी ने मोहसिन और उसके दोस्त वसीम पर हमला किया और उन्हें हॉकी स्टिक, बल्लों और पत्थरों से मारना शुरू कर दिया।

यद्यपि सत्र अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी, पर हाई कोर्ट ने कुछ कड़े बयानों के साथ इसकी अनुमति दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ अपील पर गौर करते हुए कोर्ट के इस बयान का अनुमोदन नहीं किया। न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा कि कोर्ट के ब्यान का गलत अर्थ लगाया जा सकता है ...इसे हत्या को सही ठहराने जैसा माना जा सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि मृतक किसी समुदाय विशेष का था इसका मतलब यह नहीं है कि उस पर हमले किये जाएं और हत्या की बात तो दूर है।

पीठ ने कहा कि हत्या में शामिल लोगों के समुदाय के बारे में बताने की बात को समझा जा सकता है, पर यह समझना कठिन है कि यह क्यों कहा गया कि “मृतक की गलती सिर्फ यह है कि वह एक अन्य समुदाय का था।” फिर यह कहना कि “मैं मानता हूँ कि यह बात आवेदनकर्ताओं/आरोपियों के पक्ष में जाता है”। हमें इस बात में संदेह नहीं है कि अदालत यह बखूबी जानता है कि इस देश की संरचना बहुरंगी है और विभिन्न समुदायों के अधिकारों से निपटने की जब बात आती है तो हम इस तरह के बयान नहीं दे सकते जो कि किसी पक्ष में लगे या किसी समुदाय के खिलाफ लगे”।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट की मंशा हिंसा के शिकार व्यक्ति के खिलाफ किसी तरह के पक्षपात की संभावना को समाप्त करने की रही हो और किसी समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाने की नहीं। कोर्ट ने, इस तरह, इस आदेश को निरस्त कर दिया और कहा कि शब्दों की आलोचना की हमेशा आशंका रहती है।

चूंकि हाई कोर्ट में इस आदेश के गुण-दोष पर शायद ही कोई चर्चा हुई, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की अर्जी को वापस हाई कोर्ट के ध्यानार्थ भेज दिया। पक्षकारों को निर्देश दिया गया कि वे 16 फरवरी 2018 को हाई कोर्ट में पेश हों।


 
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