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महाराष्ट्र कोर्ट फीस संशोधन अधिनियम को अधिसूचित नहीं किये जाने के कारण इसको चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित

LiveLaw News Network
5 Feb 2018 8:38 AM GMT
महाराष्ट्र कोर्ट फीस संशोधन अधिनियम को अधिसूचित नहीं किये जाने के कारण इसको चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित
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महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र कोर्ट फीस (संशोधन) अधिनियम को अभी तक अधिसूचित नहीं किया है। उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस अधिनियम को चुनौती देनी वाली याचिका पर सुनवाई को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया है।

वृहस्पतिवार को बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र कोर्ट फीस (संशोधन) अधिनियम को चुनौती देनी वाली याचिका पर सुनवाई को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। कोर्ट ने इस मामले को अदालत में तब लाने को कहा है जब राज्य सरकार इसको अधिसूचित कर देती है।

कोर्ट ने यह फैसला तब किया जब महाधिवक्ता ने इस याचिका के औचित्य पर सवाल उठाया और कहा कि यह संशोधन विधेयक लागू तभी होगा जब राज्य सरकार इसे सरकारी गजट में अधिसूचित करेगी। और अभी तक इस तरह की अधिसूचना जारी नहीं हुई है।

न्यायमूर्ति रणजीत मोरे और न्यायमूर्ति प्रकाश नाइक की पीठ ने औरंगाबाद में बॉम्बे हाई कोर्ट के एडवोकेट एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह कहा।

याचिका की पैरवी करते हुए उसके वकील एसबी तालेकर ने कहा कि अधिनियम के अधिसूचित हो जाने के बाद इस मामले को न्यायालय में लाने की अनुमति के साथ याचिका को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया जा सकता है।

कोर्ट ने उनकी इस दलील को मान ली और मामले की सुनवाई अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी।

इस याचिका में कहा गया था कि सरकार इस कोर्ट फीस अधिनियम की आड़ में कोर्ट फीस में भारी वृद्धि कर आम राजस्व में बढ़ोतरी करना चाहती है।

याचिका के अनुसार, “सरकार ने हाल के वर्षों में कोर्ट और ट्रिब्यूनलों के प्रशासन पर खर्च में बढ़ोतरी नहीं की है और न ही उसने सेवा की गुणवत्ता में सुधार का कोई प्रस्ताव ही सामने रखा है। इस तरह सरकार की मंशा स्पष्ट है कि वह इस वृद्धि के माध्यम से अपनी कमाई बढ़ाना चाहती है। फिर, सरकार को कोर्ट फीस के रूप में भारी राशि प्राप्त होती है क्योंकि हाल के वर्षों में मुकदमों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।

याचिका में कहा गया कि इस तरह कोर्ट फीस में अधिनियम में संशोधन द्वारा मनमानी वृद्धि न्याय तक लोगों की पहुँच संबंधी अधिकारों का हनन करता है।


 
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