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रक्षा मंत्रालय ने लघु सेवा और महिला अधिकारियों को मिलने वाली सुविधाओं और प्रोमोशन के खिलाफ अपील को सुप्रीम कोर्ट से वापस लिया

LiveLaw News Network
30 Jan 2018 7:58 AM GMT
रक्षा मंत्रालय ने लघु सेवा और महिला अधिकारियों को मिलने वाली सुविधाओं और प्रोमोशन के खिलाफ अपील को सुप्रीम कोर्ट से वापस लिया
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लगभग 100 से अधिक महिला सैन्य अधिकारियों को उस समय एक बड़ी राहत मिली जब रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट से उनके खिलाफ अपील को वापस ले लिया। यह अपील लघु सेवा और 2006 से पहले भर्ती किए गए कमीशंड महिला अधिकारियों को प्रोमोशन और लाभ नहीं देने से जुड़ा था। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस निर्णय को स्वीकार कर लिया और इसके बाद यह अपील सुप्रीम कोर्ट से वापस ले लिया गया।

सरकार ने 2004 में दो, छह और 13 सालों की सेवा वाले क्रमशः कैप्टेन, मेजर और लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के अधिकारियों को अजय विक्रम सिंह समिति की सिफारिशों को मानते हुए प्रोमोशन देने के सुझावों को मान लिया था। यद्यपि प्रोमोशन का यह प्रावधान सभी कमीशंड अधिकारियों पर लागू होना था, पर बाद में लघु सेवा और महिला अधिकारियों को दिए जाने वाले लाभों को रोक दिया गया और ये लाभ इन अधिकारियों को नहीं दिए गए।

हालांकि, 2006 में, जब लघु सेवा योजना को 5+5+4 सालों से बदलकर 10+4 सालों की व्यवस्था में बदल दिया गया तो इसका लाभ उन अधिकारियों को भी दिया गया जिन्होंने नई व्यवस्था को चुना था। इसकी वजह से इस तरह की विसंगतियां पैदा हुईं कि वरिष्ठ अधिकारी तो लेफ्टिनेंट और कैप्टेन के पद से रिटायर किए गए जबकि कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल के रैंक तक पहुँचने में कामयाब रहे।

मार्च 2012 में सैन्य बल अधिकरण ने इस व्यवस्था को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति एके माथुर  (अध्यक्ष) और लेफ्टिनेंट जनरल एसएस ढिल्लों (सदस्य) की पीठ ने अपने फैसले में कहा, “हमारा मानना है कि जिन लोगों की लघु सेवा कमीशंड अधिकारी के रूप में भर्ती की गई उन्हें स्थाई कमीशंड अधिकारी की तरह ही व्यापक रैंक दिया जाना चाहिए...इसलिए इस याचिका की अनुमति दी जाती है और प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं और इसी तरह के अन्य लोगों को स्थाई कमीशंड अधिकारी का रैंक दें ताकि इस मुद्दे को लेकर ट्रिब्यूनल और अदालतों में आगे और याचिकाओं की बाढ़ रोकी जा सके।”

सेना और रक्षा मंत्रालय दोनों ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। रक्षा मंत्री ने मुकदमों में कमी लाने के लिए 2015 में एक समिति गठित की थी और इस समिति ने इस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करने के लिए रक्षा मंत्रालय और सेना की जमकर आलोचना की थी। समिति ने कहा था, “यह समझ में नहीं आता कि क्यों लाभकारी नीतियों को निराशावादी दृष्टिकोण से देखा जाता है...और इनके खिलाफ अपील दायर की जाती है जबकि मामले को उचित तरीके के न्यायिक हस्तक्षेप द्वारा सुलझाया जा सकता है।”

समिति ने कहा, यह अपील “इज्जत का सवाल” जैसा लगता है. समिति ने सुप्रीम कोट में दाखिल इस अपील को वापस लेने का आदेश दिया और कहा कि जो गड़बड़ियाँ पैदा हुई हैं वे खुद का किया हुआ है और यह नकारात्मक व्याख्या के कारण पैदा हुआ है क्योंकि मंत्रिमंडल ने सभी अधिकारियों के लिए इसे स्वीकृति दी थी।

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