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आधार पर तीसरे दिन की सुनवाई: आधार क़ानून की जांच ऐसे ही की जाए जैसे उस क़ानून की जांच की जाती है जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है : श्याम दीवान; निजता पर अब तक के फैसले दीवान के पक्ष में

LiveLaw News Network
23 Jan 2018 4:55 PM GMT
आधार पर तीसरे दिन की सुनवाई: आधार क़ानून की जांच ऐसे ही की जाए जैसे उस क़ानून की जांच की जाती है जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है : श्याम दीवान; निजता पर अब तक के फैसले दीवान के पक्ष में
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मंगलवार को आधार अधिनियम 2016 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फिर सुनवाई शुरू हुई। वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने पांच जजों की संविधान पीठ को 24 अगस्त 2017 को दिए गए फैसले के विभिन्न पक्षों के बारे में बताया।

दीवान ने कहा :

“यह फैसला निजता के मौलिक अधिकार की घोषणा करता है...जजों का कहना है कि यह अधिकार पहले से ही मौजूद था...यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है”।

निजता का अधिकार एक स्वाभाविक अधिकार है; इसे मानव से अलग नहीं किया जा सकता। हम संविधान के अध्याय III में जीवन का आनंद उठाने के लिए इसे जरूरी शर्त मानने के न्यायमूर्ति एसए बोबडे के फैसले पर भरोसा करते हैं। निजता के अधिकार के तीन आवश्य पक्ष की जहाँ तक बात है, न्यायमूर्ति एएम सप्रे का फैसला – शारीरिक काया के अतिक्रमण के खिलाफ सुरक्षा; सूचना की निजता; पसंद की आजादी को हमने संदर्भित किया है।”

“इसके बाद आजादी और गरिमा के साथ निजता के क्रियाशील संबंध का मामला है जिसे अवांछित अतिक्रमण के खिलाफ सुरक्षित किया जाना है। इस सिलसिले में हम अनेकता पर न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के फैसले पर भरोसा करते हैं – यद्यपि निजता से वैध अपेक्षा अंतरंग क्षेत्र से निजी क्षेत्र तक जाता है और फिर वहाँ से सार्वजनिक क्षेत्र में, निजता इसलिए नहीं समाप्त हो जाती है क्योंकि कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर है।”

“निजता का अधिकार आजादी और गरिमा में गुंथा हुआ है। न्यायमूर्ति बोबडे, चंद्रचूड़ और रोहिंटन नरीमन ने अपने फैसले में इसी बात को दुहराया है।”

“निजता के सिद्धांत के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं। जहाँ तक नकारात्मक अधिकार की बात है, यह नागरिकों को राज्य के अनाधिकार अतिक्रमण से बचाता है और जहाँ तक इसके सकारात्मक अधिकार की बात है तो यह राज्य के लिए अपने नागरिकों की निजता के अधिकार को बचाना बाध्यकारी बना देता है। इस संदर्भ में न्यायमूर्ति एसके कौल का फैसला जो कि सरकार की शक्ति की सीमा की बात करता है, प्रासंगिक है।”

“यह दलील कि ‘गरीब को नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की जरूरत नहीं होती और उनकी चिंता सिर्फ आर्थिक भलाई तक सीमित है’ इस मामले से न्यायमूर्ति नरीमन और चंद्रचूड़ ने अच्छी तरह से निपटा है।”

“निजता के अधिकार पर पाबंदी तभी लग सकती है जब यह पाबंदी कानून सम्मत है। इस तरह के किसी भी क़ानून को तीन शर्तों को पूरा करना होगा – क़ानून की न्याय्यता; राज्य की मंशा की वैधता; और अतिक्रमण की आनुपातिकता।”

“एक संवैधानिक लोकतंत्र बचा रहे इसके लिए जरूरी है कि उसके नागरिकों को यह आश्वासन हो कि क़ानून का शासन राज्य के अतिक्रमण के खिलाफ उनके अधिकार और उनकी आजादी की रक्षा करेगा।”

“क़ानून के शासन के दो पक्ष हैं – पहला, 9 जजों की संविधानपीठ ने कई ऐसे अंतरिम आदेश दिए जिसमें कहा गया कि आधार का प्रयोग लोगों को सामाजिक योजनाओं की हकदारी और अन्य सेवाओं से बेदखल करने में तब तक नहीं होगा जबतक कि इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, और दूसरा, आधार अधिनियम 2016 को धन विधेयक के रूप में पेश करना।

अंत में, दीवान ने फैसले के निष्कर्ष को उद्धृत करते हुए कहा, “एमपी शर्मा और खड़क सिंह के मामले में दिए गए फैसले में कहा गया कि निजता का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित नहीं है, उसे निरस्त किया जाता है।”

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