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सिर्फ आपराधिक मामलों में बरी हो जाने का मतलब यह नहीं कि उस व्यक्ति का चरित्र अच्छा है और वह न्यायिक अधिकारी के पद के लायक है: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
17 Jan 2018 7:58 AM GMT
सिर्फ आपराधिक मामलों में बरी हो जाने का मतलब यह नहीं कि उस व्यक्ति का चरित्र अच्छा है और वह न्यायिक अधिकारी के पद के लायक है: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आशुतोष पवार बनाम हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश मामले में कहा कि समझौता के आधार पर या अन्य कारणों से आपराधिक अदालत द्वारा बरी किये जाने का मतलब यह नहीं है कि उस व्यक्ति का चरित्र अच्छा है और वह न्यायिक अधिकारी के पद पर नियुक्ति के लिए लायक है।

मुख्य न्यायाधीश हेमंत गुप्ता, रविशंकर झा और नंदिता दूबे की पूर्ण पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी से आम नागरिकों की तुलना में बहुत ही उच्च दर्जे के आचरण की उम्मीद की जाती है और यहाँ तक कि क़ानून के पेशे में शामिल पेशेवर लोगों से भी ज्यादा उम्मीद न्यायिक अधिकारी से की जाती है।

पृष्ठभूमि

आशुतोष पवार सिविल जज की नौकरी पाना चाहते हैं और उन्होंने इसके लिए तीन चरणों की परीक्षा जैसे, प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार पास कर ली है और उनका नाम नियुक्ति के लिए सुझाया गया है।

पर आवेदक की खुद की घोषणा के अनुसार जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने उसके खिलाफ कुछ मामले की जांच की थी और कुछ अन्य अपराधों के लिए उसके खिलाफ मुकदमा चला था और पक्षकारों के बीच समझौता होने के बाद उसको आपराधिक अदालत ने बरी कर दिया। यह जानने के बाद अब हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामलों की स्थिति के बारे में जांच कर यह बताए कि इन मामलों का स्टेटस क्या है।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने अब कहा है कि यह व्यक्ति क्लास II सिविल जज के रूप में नियुक्ति के योग्य नहीं है। इस व्यक्ति ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की जिसने खंड पीठ द्वारा दिए गए विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए इस मामले को पूर्ण पीठ को सौंप दिया।

बरी होने का मतलब चरित्रवान होना नहीं है

पूर्ण पीठ ने कहा कि समझौते के कारण बरी कर दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार का चरित्र बहुत अच्छा है और वह इस पद पर नियुक्ति के लायक है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही किसी मामले में किसी व्यक्ति के दोषी होने या न होने की जांच करता है जबकि किसी पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति के संदर्भ में यह देखा जाता है कि वह उस पद के योग्य है कि नहीं। पीठ ने कहा, “...सक्षम अथॉरिटी को इस बारे में निर्णय लेना है कि इस पद पर जो आए वह इस पद के अनुरूप अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके...मात्र किसी आपराधिक मामले में बरी हो जाना इस बात का पर्याप्त आधार नहीं है कि उस व्यक्ति का आचरण अच्छा है।”

कोर्ट ने कहा, “एक न्यायिक अधिकारी से अपेक्षाएं काफी ऊंचे स्तर की होती है। सिविल जज के रूप में नियुक्ति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति की सादगी, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त चाहने वाले व्यक्ति का निजी व्यवहार बेदाग़ होना चाहिए...”।

पीठ ने कहा, “किसी उम्मीदवार के आपराधिक मामले में शामिल होने को देखते हुए उसकी नियुक्ति के बारे में निर्णय हाई कोर्ट ही ले सकता है। अगर राज्य के पास इस उम्मीदवार के बारे में कोई इस तरह की सूचना है जो इस उम्मीदवार की उम्मीदवारी को प्रभावित कर सकता है तो राज्य को यह सूचना हाई कोर्ट के साथ अवश्य ही साझा करनी चाहिए। कोई उम्मीदवार नियुक्ति के लिए उपयुक्त है कि नहीं यह निर्णय अंततः हाई कोर्ट को ही करना है।”


 
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