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आप सब जानना चाहते हैं उन 8 केसों के बारे में जो 17 जनवरी से संविधान पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं [ नोटिस पढें ]

LiveLaw News Network
15 Jan 2018 5:25 PM GMT
आप सब जानना चाहते हैं उन 8 केसों के बारे में जो 17 जनवरी से संविधान पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं [ नोटिस पढें ]
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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में 17 जनवरी, 2018 से आठ महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई शुरू की होगी। आधार की संवैधानिकता से संबंधित याचिकाओं, सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश और शादी के बाद पारसी महिला की धार्मिक पहचान में बदलाव आदि मामले सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री द्वारा शुक्रवार को जारी सूची में हैं।

सूची में ऐसे मामले भी शामिल हैं जिनमें संविधान पीठ पहले के फैसले पर पुनर्विचार करेगी जिनमें व्याभिचार और समलैंगिकता को अपराध घोषित किया था।

जस्टिस केएस पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम इंडिया ऑफ इंडिया [आधार या ना आधार] 

क्या आधार किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार  का उल्लंघन करता है, यह सबसे अधिक प्रतीक्षित प्रश्न है,  उम्मीद है कि जल्द ही इसका संवैधानिक पीठ उत्तर देगी। आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के सुनवाई के लिए विशेष रूप से गठित पांच जजों की पीठ ने इस बीच सीमित सवाल को विचार के लिए नौ जजों की संविधान पीठ को भेजा था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं। नौ जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि ये  वास्तव में एक मौलिक अधिकार है। हाल ही में बेंच ने बैंक खातों और मोबाइल नंबर सहित सभी सेवाओं और योजनाओं के साथ आधार संख्या के अनिवार्य संबंध के लिए समय सीमा  31 मार्च 2018 तक बढ़ा दी थी।

 कर्नाटक हाईकोर्ट के  आनंद बैराएड्डी ने आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाएं) अधिनियम, 2016 के प्रावधानों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने एक  आवेदन दायर किया था। मूल आधार प्रकरण एक अन्य पूर्व कर्नाटक हाईकोर्ट के जज जस्टिस केएस पुट्टस्वामी ने दाखिल किया था।

जोसफ साइन बनाम भारत संघ [व्यभिचार कानून पुराना ?]

व्याभिचार के मामलों में महिला को IPC की धारा 497 के तहत कानूनी कार्रवाई से मिले हुए सरंक्षण को चुनौती देने वाली याचिका को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच ने पांच जजों की संविधान पीठ को भेज दिया था।
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा था कि वो  1954  और 1985 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों  से सहमत नहीं है जिसमें कहा गया IPC 497 महिलाओं से भेदभाव नहीं करता।

बेंच ने कहा कि सामाजिक प्रगति, लैंगिक समानता और लैंगिक संवेदनशीलता को देखते हुए पहले के सुप्रीम कोर्ट के फैंसलों पर फिर से विचार करना होगा।8 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को मंजूर कर लिया था और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।
दरअसल IPC की धारा  497 एक विवाहित महिला को सरंक्षण देती है भले ही उसके दूसरे पुरुष से संबंध हों। ये धारा महिला को ही पीडित मानती है भले ही महिला और पुरुष दोनों ने सहमति से संबंध बनाए हों।

केरल के एक्टिविस्ट जोसफ साइन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर IPC 497 की वैधता को चुनौती दी है। उनका कहना है कि पहले के तीन फैसलों में इसे बरकरार रखा गया और संसद को कानून में संशोधन करने की छूट दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील कलीश्वरम राज ने कोर्ट में कहा कि ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। महिला को कार्रवाई से सरंक्षण मिला हुआ है चाहे वो उकसाने वाली हो। वकील ने कहा कि एक महिला ना तो शिकायतकर्ता हो सकती है और ना ही उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट  ने कहा था कि जब संविधान महिला और पुरूष दोनों को बराबर मानता है तो आपराधिक केसों में ये अलग क्यों है ? जीवन के हर तौर तरीकों में महिलाओं को समान माना गया है तो इस मामले में अलग से क्यों बर्ताव हो ? जब अपराध को महिला और पुरुष दोनों की सहमति के किया गया हो तो महिला को सरंक्षण क्यों दिया गया ?  सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो इस प्रावधान की वैधता पर सुनवाई करेगा। किसी भी आपराधिक मामले में महिला के साथ अलग से बर्ताव नहीं किया जाता और दूसरे अपराध में लैंगिक भेदभाव नहीं होता।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति महिला के साथ वस्तु की तरह बर्ताव नहीं कर सकता और महिला को कानूनी कार्रवाई से सरंक्षण मिलना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ये पुराना प्रावधान लगता है जब समाज में प्रगति होती है तो पीढियों की सोच बदलती है। कोर्ट ने कहा कि इस बारे में नोटिस जारी किया जाता है और आपराधिक केसों में सामान्य तटस्थता दिखानी चाहिए।

सुमित्री विष्णु मामले में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह धारण किया था कि व्यभिचार के अपराध को परिभाषित करने में कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है, ताकि अपराधियों के वर्ग में पुरुषों को प्रतिबंधित किया जा सके। तीन दशक बाद, उनके बेटे, जो अब सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने मामले के दाखिले के दौरान कहा कि पत्नी को अपने पति के  अधिनियम के तहत सहमति देने के लिए कोई वस्तु नहीं माना जा सकता। इस निर्णय को पुनर्विचार की आवश्यकता है।

इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य ( सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश ) 

केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 साल 50 साल की उम्र की महिलाओं  के प्रवेश पर रोक के मामले की सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ करेगी।
इससे पहले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगवाई में तीन  जजों की बेंच ने संविधान पीठ को ये मामला सुनवाई के लिए भेजा था।
दरअसल इस जनहित याचिका में कहा गया है कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश ना करने देना उनके साथ भेदभाव करना है। इससे पहले केरल की UDF सरकार ने भी मंदिर प्रशासन के समर्थन में कहा था कि धार्मिक मान्यताओं की वजह से महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी और तपस्या लीन माना जाता है। लेकिन सरकार बदलने के बाद पिछले साल नवंबर में UDF सरकार ने स्टैंड बदलते हुए कहा कि मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत देनी चाहिए।
दरअसल सबरीमाला मंदिर में परंपरा के अनुसार, 10 से 50 साल की महिलाओं की प्रवेश पर प्रतिबंध है। मंदिर ट्रस्ट की मानें तो यहां 1500 साल से महिलाओं की प्रवेश पर बैन है। इसके लिए कुछ धार्मिक कारण बताए जाते रहे हैं। केरल के यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने बैन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 2006 में पीआईएल दाखिल की थी. करीब 11 साल से यह मामला कोर्ट में लटका हुआ है।
संविधान पीठ को भेजे गए सवाल :
1. क्या महिला को बॉयोलाजिकल फैक्टर के आधार पर मंदिर में प्रवेश पर रोक समानता के अधिकारों उल्लंघन करता है ?
2.  क्या महिलाओं पर रोक के लिए धार्मिक संस्था में चल रही इस प्रथा को इजाजत दी जा सकती है ?
3. क्या सबरीमाला धार्मिक संस्था की ये रोक संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में है ?
3. क्या अयप्पा मंदिर अलग धार्मिक संस्था है और अगर है तो क्या वो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का हनन कर सकता है और ऐसे महिलाओं को रोका जा सकता है ?
4. क्या महिलाओं पर रोक केरला हिंदू पब्लिक वर्शिप एंट्री एक्ट का हनन है ?

नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ ( धारा 377) 

एक बडा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में दो जजों की बेंच के उस फैसले पर दोबारा विचार करने पर सहमति जता दी जिसके तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने पांच LGBT नागरिकों द्वारा दाखिल याचिका को संविधान पीठ के लिए भेजा था।
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाज फाउंडेशन मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है क्योंकि कोर्ट को लगता है कि इसमें संवैधानिक मुद्दे जुडे हुए हैं। दो व्यस्कों के बीच शारीरिक संबंध क्या अपराध हैं, इस पर बहस जरूरी है। अपनी इच्छा से किसी को चुनने वालों को भय के माहौल में नहीं रहना चाहिए। कोई भी इच्छा के तहत कानून के चारों तरफ नहीं रह सकता लेकिन सभी को अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार के तहत कानून के दायरे में रहने के अधिकार है। सामाजिक नैतिकता वक्त के साथ बदलती है। इसी तरह कानून भी वक्त के साथ बदलता है।  सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका की प्रति सेंट्रल एजेंसी में देने को कहा है ताकि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार अपना पक्ष रख सके।
वहीं। सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश  वरिष्ठ वकील  कपिल सिब्बल और अरविंद दातार ने कहा कि संविधान के भाग III के तहत गारंटी के साथ अन्य मूलभूत अधिकार जिसमें  लैंगिकता, यौन स्वायत्तता, यौन साथी, जीवन, गोपनीयता, गरिमा और समानता के अधिकार भी दिए गए हैं। लेकिन भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 377 याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का हनन करती है।
वकीलों ने कहा  हालांकि कौशल फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव  याचिका सुप्रीम कोर्ट के  सामने लंबित है लेकिन याचिकाकर्ताओं द्वारा वर्तमान याचिका में धारा 377 को दी गई चुनौती के मुद्दे अलग-अलग हैं। क्यूरेटिव याचिका में याचिकाकर्ता ने कानून के निम्नलिखित प्रश्न उठाए हैं;
क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377 भारत के संविधान के भाग III के तहत असंवैधानिक और उल्लंघनकारी है, और इसे रद्द किया जाना चाहिए ?  वैकल्पिक रूप से चाहे भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निजी तौर पर वयस्कों के समलैंगिक यौन कृत्य पर इस्तेमाल करने से अलग किया जा सकता है  ताकि इस तरह के सहमति वाले वयस्कों के मौलिक अधिकार सुरक्षित-संरक्षित हों?
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक  स्वतंत्र भारत में क़ानून की किताबों में IPC 377 जारी रखने से ये बहुत स्पष्ट हो जाता है कि संवैधानिक अनुबंध के आधार पर समानता, बिरादरी, गरिमा, जीवन और स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटीयां जिनसे देश की स्थापना हुई थी, उन्हें याचिकाकर्ताओं तक नहीं बढ़ाया गया है।
गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध माना था। 2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने 1PC 377 को अंसवैधानिक करार दिया था। इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी और फिलहाल पांच जजों के सामने क्यूरेटिव बेंच में मामला लंबित है।

गुलरुख एम गुप्ता बनाम सैम रूसी चौथिया अन्य ( शादी के बाद अधिकार) 

 सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ये तय करेगी कि क्या पारसी महिला किसी दूसरे धर्म के पुरुष से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने के बाद अपने धर्म का अधिकार खो देती है?
गुलरख एम गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर  गुजरात हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि पारसी महिला अपने धर्म का अधिकार खो देती है जब वो किसी दूसरे धर्म के पुरुष से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करती है। इतना ही नही हाई कोर्ट ने ये भी कहा था कि अब आप पारसी नही रही भले ही आपने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी की है।गुलरख गुप्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि वो पारसी है लेकिन उन्होंने हिंदू से शादी की है।उनके पिता 80 साल के है और उन्हें पता चला कि अगर पारसी महिला दूसरे धर्म में शादी कर ले तो उसे पति के धर्म का ही मान लिया जाता है,और पारसी मंदिर में पूजा के अलावा अंतिम संस्कार के लिए पारसियों के टावर आफ साइलेंस में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इसके बाद उन्होंने पारसी ट्रस्टियों से बात की तो कहा गया कि वो अब पारसी नहीं रहीं। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पति के धर्म में परिवर्तित हो गई है।महिला इस मामले को लेकर गुजरात हाईकोर्ट गईं लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।  हालांकि पारसी पंचायत की दलील थी कि ये स्पेशल मैरिज एक्ट का मामला नहीं बल्कि पारसी पर्सनल ला का है और ये कई  सौ साल पुरानी प्रथा है। इस संबंध में सारे दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं।

 सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू से शादी करने वाली पारसी महिला को अपने मां- पिता के अंतिम संस्कार की रस्मों के लिए पारसी टावर ऑफ साइलेंस में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया।

वलसाड पारसी अंजुमन ट्रस्ट ने पारसी महिला को उनके अभिभावकों के अंतिम संस्कार की रस्मों के लिए टेंपल ऑफ साइलेंस में प्रवेश की इजाजत देने संबंधित अंडरटेकिंग कोर्ट में दाखिल की जिसे स्वीकार कर लिया गया।
ट्रस्ट की ओर से सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ में वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने एक मेमो सुप्रीम कोर्ट को सौंपा. इसके मुताबिक महिला व उनकी बहन को को पारसी टेंपल ऑफ साइलेंस में पैरेंटस की अंतिम संस्कार संबंधी रस्मों के लिए इजाजत दी गई है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगवाई वाली संविधान पीठ ने इस पर मुहर लगाते हुए अंतरिम आदेश जारी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि प्रथम दृष्टया दूसरे धर्म में की गई शादी के बाद महिला के धर्म उसके पति के धर्म व आस्था में समाहित होने का कोई कानूनी सिद्धांत नहीं है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुई है तो   पहले से ही ये नहीं कहा जा सकता कि महिला ने शादी के बाद पति के धर्म और आस्था को अपना लिया है। ये सिर्फ महिला ही तय कर सकती है कि उसकी धार्मिक पहचान क्या होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है कि महिला की शादी के बाद अपना धर्म खो देती है। जबकि स्पेशल मैरिज एक्ट इस बात का प्रावधान करता है कि अगर दो लोग जो अलग-अलग धर्म के हैं और शादी करते हैं तो वह अपने-अपने धर्म के साथ रह सकते हैं।
महिला की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने  कोर्ट में कहा कि एक आदमी पारसी धर्म के बाहर जाकर अगर शादी करता है तो उसका  धर्म धर्म बना रहता है लेकिन महिला अगर धर्म केबाहर जाकर शादी करती है तो उसकी धार्मिक पहचान नहीं रह जाती और वह पारसी धर्म और आस्था के हिसाब से नहीं चल सकती। ये सीधे सीधे मौलिक अधिकारों का हनन है।

पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन भारत बनाम भारत संघ  ,[क्या किसी सांसद या विधायक को उसके खिलाफ आरोप तय करने के चरण में अयोग्य घोषित किया जा सकता है] 

सवाल यह है कि क्या आपराधिक मामलों  का सामना करने वाले सांसद या विधायक को अदालत के खिलाफ आरोप तय करने के चरण में अयोग्य ठहराया जाना चाहिए, संविधान पीठ इसका जवाब देगी।

इससे पहले निम्नलिखित प्रश्न को तीन जजों की बेंच में भेजा गया था: "क्या सदस्यता के लिए अयोग्यता अनुच्छेद 102 (ए) से (डी) और अनुच्छेद 120 (ई) के तहत संसद द्वारा बनाई गई कानून से परे न्यायालय द्वारा निर्धारित कीजा सकती है?"

केंद्र ने संवैधानिक न्यायालय के फैसले पर निर्भरता जताते हुए  कहा कि  निर्दिष्ट प्रश्न का जवाब दिया जा चुका है।

जस्टिस मदन बी लोकुर ने   मनोज नरुला विरुद्ध भारत संघ में एक अलग फैसले में कहा था: "तथ्य के बावजूद कि कुछ सीमाएं संविधान में पढ़ी जा सकती हैं और पूर्व में पढ़ी जा सकती हैं, एक उपयुक्त व्यक्ति की मंत्री के रूप में नियुक्ति

के मुद्दे  पर ऐसा नहीं है जो इस न्यायालय को संविधान में अंतर्निहित सीमाओं को पढ़ने में सक्षम बनाता है। " बेंच ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह संदर्भ का जवाब देती है और बाद में उसे संविधान पीठ के लिए भेजा गया था

मैसर्स शांति  फ्रेग्रेन्स बनाम भारत सरकार  [टैक्स जारी और प्रीविन्डेंस के मौजूदा नियम का पुनरीक्षण] 

इस मामले में, संविधान पीठ यह तय करेगी कि क्या कोठारी प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम आंध्र प्रदेश सरकार या आयुक्त, बिक्री कर यूपी बनाम मैसर्स आगरा बेल्टिंग वर्क्स, आगरा में उल्लिखित विरोधाभास सही है या नहीं। कोठारी प्रोडक्ट्स के मामले में तीन जजों की बेंच ने यह माना था कि विक्रय कर संहिता के तहत एक प्रविष्टि जो केवल दर निर्दिष्ट करती है, उसे छूट प्रविष्टि में  इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जबकि आगरा बेल्ट वर्क्स में यह माना गया है कि चार्जिंग अनुभाग, टैक्स अनुभाग की दर और छूट अनुभाग सभी एक योजना का हिस्सा होते हैं और जब कोई टैक्स विभाग की दर से अधिसूचना जारी की जाती है, जो उसके बाद एक कुछ वस्तुओं को छूट देने की अधिसूचना को वापस ले लिया जाता है और ऐसे सामानों की बिक्री कर के लिए उत्तरदायी होती है।

न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हिल्ली मल्टीपर्पज कोल्ड स्टोरेज (पी) लिमिटेड [उपभोक्ता मामले में पार्टी संस्करण के सामने दाखिल करने की सीमा शुरू करना] 

इस मामले में संविधान पीठ के सामने सवाल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 13 में निर्धारित 30 दिनों की सीमा के प्रारंभ बिंदु के बारे में है। तीन जजों की बेंच ने यह धारण किया था कि जिला उपभोक्ता फोरम इसके संस्करण या उत्तर दर्ज करने के लिए विपरीत पक्ष में 15 दिन का और अतिरिक्त अवधि दे सकता है और इससे परे नहीं। पीठ ने यह भी कहा था कि जे जे मर्चेंट के मामले में तीन जजों  की एक बेंच  ने कहा था कि निर्धारित कानून को प्रबल होना चाहिए। हालांकि, जस्टिस चेलामेश्वर  की अध्यक्षता वाली बेंच ने जे जे मर्चेंट के मामले में किए गए घोषणापत्र को देखा और  कहा कि उल्लिखित पार्टी द्वारा ये अवधि तत्काल पक्ष द्वारा प्राप्त की जाने वाली तारीख से या किसी अधिनियम के तहत शिकायत की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण विश्लेषण की आवश्यकता है।

 

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