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SC ने कर्नाटक HC के तंबाकू उत्पाद पैकेटों पर बडी सचित्र चेतावनी के नियम को रद्द करने के फैसले पर रोक लगाई [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
9 Jan 2018 3:57 PM GMT
SC ने कर्नाटक HC के तंबाकू उत्पाद पैकेटों पर बडी सचित्र चेतावनी के नियम को रद्द करने के फैसले पर रोक लगाई [आर्डर पढ़े]
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच ने सोमवार को कर्नाटक हाईकोर्ट के 15 दिसंबर 2017 के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी जिसमें सिगरेट व अन्य तम्बाकू उत्पाद (पैकेजिंग और 2014 में संशोधन) लेबलिंग नियम) 2008 को रद्द कर दिया था।

 इस केनियम 3 (1) (बी) के तहत यह आवश्यक है कि सिगरेट, पैन मसाला और अन्य तम्बाकू पैकेटों पर  कम से कम 85% वैधानिक चेतावनी छपी होगी जिसमें मुंह, गले और फेफड़ों के कैंसर के सचित्र चित्रण के लिए 60% और 25% लिखित स्वास्थ्य चेतावनी होनी चाहिए। हाईकोर्ट के फैसले से इन पैकेटों पर 40 फीसदी चेतावनी छापने का नियम प्रभावी हो गया था।

 संशोधित नियमों में स्पष्ट रूप से उन छवियों या चित्रों का उपयोग करने पर रोक है जिनसे

 किसी भी विशिष्ट ब्रांड को बढ़ावा देने के प्रभाव हो या जो वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी से असंगत हो। ये नियम विशेष विवरण के प्रकाशन पर भी जोर देते हैं जिनमें निर्माता, आयातक या पैकर का नाम और पता शामिल है, उत्पाद की तारीख और उत्पाद की उत्पत्ति छपी हो।

 सोमवार को, अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने बेंच के समक्ष कहा ,” ऐसा जीवन सेहत से रहने योग्य नहीं है  और तम्बाकू चबाने या सिगरेट या बीड़ी आदि के धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त जोखिम का कारण बनता है और राज्य का ये दायित्व है कि वो लोगों को इसकी हानियों के प्रति जागरुक कराए।”

तंबाकू के इस्तेमाल पर बोलते हुए AG ने कहा कि सिर्फ इसे पीडित ही नहीं भुगतता बल्कि पूरा परिवार सहता है और आखिरी में पूरा समाज ही इससे प्रभावित होता है।

हाईकोर्ट  के फैसले की आलोचना करते हुए वेणुगोपाल, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद के अलावा वरिष्ठ वकील  आनंद ग्रोवर और आरएस सूरी ने कहा कि हाईकोर्ट ने गलत आधार पर संशोधन को रद्द किया और इसके चलते प्रतिवादी फायदे में रहेंगे। इस तरह वो अप्रिय और जहरीले उत्पादों को बाजार में बिना किसी चेतावनी या पैकेजिंग पर 40% चेतावनी के साथ बेंचेंगे। उन्होंने कहा कि ये उपयुक्त मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए और पूरी तरह न्याय के लिए आदेश देना चाहिए।

वहीं प्रतिवादियों के लिए पेश वरिष्ठ वकील   कपिल सिब्बल, सीएस वैद्यनाथन और अशोक भान ने इसका कडा विरोध किया और कहा कि हाईकोर्ट संशोधकीय आंकड़ों के अभाव के चलते संशोधित नियमों को रद्द करने लिए सहमत हुआ था। अगर नोटिस के चरण पर अंतरिम रोक लगाई गई तो ये एक तरीके से याचिका को मंजूर करना होगा और इसकी जरूरत नहीं है।

याचिकाकर्ताओं के लिए वकीलों की दलीलों का विरोध करते हुए, उन्होंने कहा कि जो चित्रमय चेतावनी पेश की गई है, वह बिल्कुल भयावह है।  इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया था कि जब उत्पादों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं था, तो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत उत्तरदाताओं का अधिकार सुरक्षित है। संविधान के अनुच्छेद 1 9 (1) (जी) के तहत

85% तक की सचित्र चेतावनी एक उचित प्रतिबंध नहीं है।

 अंत में कपिल सिब्बल द्वारा नियम 5 के हवाले से ये प्रस्ताव दिया गया कि  मार्च 31, 2018 के बाद वाले उत्पाद पैकेजों पर निर्दिष्ट स्वास्थ्य चेतावनी के लिए सुप्रीम कोर्ट अंतरिम तौर पर 50% चेतावनी के आदेश दे सकता है और फिर मामले की सुनवाई कर सकता है।

हालांकि इस  सुझाव का केके वेणुगोपाल और अन्य वकीलों ने जमकर विरोध किया और कहा कि नागरिकों के स्वास्थ्य खतरों की संभावना को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा विशेषज्ञों की राय के आधार पर  प्रतिशत तय करने का निर्णय लिया गया है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को प्रतिशत तय नहीं करना चाहिए, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगानी चाहिए।

 वेणुगोपाल ने उत्तर प्रदेश और अन्य बनाम हरेंद्र पाल सिंह एंड ऑर। [(2011) 5 एससीसी 305] के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि  2014 के नियमों को रद्द किए जाने के बावजूद, 2008 के नियम जीवित नहीं होंगे।

 उत्तरदाताओं के प्रस्तुतीकरण को अनदेखा करते हुए कि रोक से उनके व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, बेंच ने नागरिकों के स्वास्थ्य की  प्राथमिकता और "स्वास्थ्य के विनाश" से लोगों को जागरूक करने के तहत रोक लगाने का फैसला लिया।

 सिगरेट और  अन्य तम्बाकू उत्पाद (व्यापार और वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति और वितरण के प्रतिबंध और 2003 के निषेध) अधिनियम 2003 के उद्देश्य के मद्देनजर सोमवार को बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और मामले की अंतिम सुनवाई के लिए 12 मार्च की तारीख तय की।


 
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