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“बैटल ऑफ़ बनारस” फिल्म को प्रमाणपत्र नहीं देने पर सीबीएफसी को दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार; दुबारा जांच करने को कहा [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
7 Jan 2018 2:19 PM GMT
“बैटल ऑफ़ बनारस” फिल्म को प्रमाणपत्र नहीं देने पर सीबीएफसी को दिल्ली हाई कोर्ट की फटकार; दुबारा जांच करने को कहा [निर्णय पढ़ें]
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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के “ बैटल ऑफ़ बनारस ” फिल्म को आम दर्शकों को दिखाने के लिए प्रमाणपत्र नहीं देने के फैसले को निरस्त कर दिया। यह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है जिसमें 2014 के बनारस लोकसभा चुनाव के लिए हुए चुनाव प्रचार को दिखाया गया है। इस चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी, एएपी के अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के अजय राय मुख्य रूप से चुनाव लड़ रहे थे।

न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा ने फिल्म प्रमाणन अपीली ट्रिब्यूनल (एफसीएटी) को फिल्म “बैटल ऑफ़ बनारस” की चार सप्ताह के भीतर दुबारा जांच करने और विवादास्पद दृश्यों और संवादों के ब्योरे के साथ कारण बताने को कहा है।

सीबीएफसी ने इस फिल्म को आम दर्शकों को दिखाने के लिए प्रमाणपत्र देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि यह डाक्यूमेंट्री नेताओं द्वारा विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों के बारे में अपमानजनक टिप्पणियों और घृणास्पद/भड़काऊ संवादों से भरा है। उसका कहना था कि अगर इस डाक्यूमेंट्री को आम लोगों के लिए रिलीज़ किया गया तो इससे साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और दंगे भड़क सकते हैं और आम जीवन में गड़बड़ियाँ पैदा हो सकती हैं। एफसीएटी ने सीबीएफसी के इस मत से सहमति जताई थी और उसको सही ठहराया था। इसके बाद इस डाक्यूमेंट्री के निर्माता मनु कुमारन ने सीबीएफसी के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी जिस पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने उक्त आदेश दिया।

शुरू में न्यायमूर्ति सचदेवा ने फिल्म प्रमाणन के कानूनी पहलुओं के बारे में बताया और कहा, “किसी फिल्म को इस आधार पर प्रमाणपत्र देने से मना नहीं किया जा सकता कि कुछ चरित्र और घटनाएं वास्तविक दुनिया के व्यक्तित्वों और व्यक्तियों से मेल खाती हैं। संविधान सिर्फ कलात्मक विषयों के काल्पनिक चित्रणों को ही अपना संरक्षण नहीं देता...

... वयस्क भारतीय नागरिकों में यह भरोसा जताया जा सकता है कि वे फिल्म के संदेशों को अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए समझेंगे और तदनुरूप प्रतिक्रिया करेंगे न कि किसी दृश्य विशेष से वे उत्तेजित हो जाएंगे।”

इसको वर्तमान मामले के परिप्रेक्ष्य में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि यह डाक्यूमेंट्री वास्तव में किसी का पक्ष नहीं लेता। कोर्ट का कहना था, “इस फिल्म को देखने और इसकी स्क्रिप्ट को पढने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें इस तरह का कोई दृश्य और ऐसा कोई संवाद नहीं है जिससे मानहानि हो सकती है, जो अपमानजनक है और जिसे गालीगलौज कहा जा सकता है और न ही ये ऐसे हैं जिससे आम जीवन पर असर पड़ेगा, अश्लीलता पैदा होगी, अनैतिकता बढ़ेगी या देश की संप्रभुता या इसकी अखंडता पर ख़तरा पैदा जो जाएगी।”

कोर्ट ने इसके बाद कहा कि सीबीएफसी और एफसीएटी उस हिस्से के बारे में बताने में विफल रहे हैं जिससे सिनेमेटोग्राफी अधिनियम, 1962 का कथित रूप से उल्लंघन होता है।

कोर्ट ने आगे कहा, “यह फिल्म आम चुनाव के समय विभिन्न नेताओं और पार्टी उम्मीदवारों द्वारा दिए गए भाषणों को दुबारा उल्लेख किया गया है। यह बोर्ड या एफसीएटी का काम नहीं है कि वे ये देखें कि निर्माता ने जो दिखाया है वह जो हुआ है उसका सही स्वरूप है कि नहीं। यह देखना प्रतिवादी का काम नहीं है कि याचिकाकर्ता ने जो दिखाया है वह उम्मीदवारों के भाषणों का हिस्सा नहीं है।

याचिकाकर्ता ने इस फिल्म में विभिन्न उम्मीदवारों, पार्टी कार्यकर्ताओं या पार्टी नेताओं के विचारों और उनके भाषणों के अंशों को रखा है। इस फिल्म को पूरा देखकर यह नहीं लगता कि इसका विषय घृणात्मक या भड़काऊ भाषणों से भरा है। इस फिल्म को देखकर किसी को यह नहीं लग सकता कि यह फिल्म लोगों को जाति और साम्प्रदायिक आधार पर बांटता है।”


 
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