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मेडिकल कॉलेज घोटाले की SIT जांच की खारिज याचिका पर CJAR ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका [याचिका पढ़े]

LiveLaw News Network
5 Jan 2018 4:38 AM GMT
मेडिकल कॉलेज घोटाले की SIT जांच की खारिज याचिका पर CJAR ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका [याचिका पढ़े]
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कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबलिटी एंड रिफार्म्स ( CJAR) ने सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायिक संस्थान में भ्रष्टाचार के आरोपों की स्वतंत्र जांच की याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है।

दरअसल केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने इस मामले को लेकर FIR दर्ज की थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक पूर्व जज आईएम कूदुसी समेत कुछ लोगों ने एक मेडिकल कॉलेज को राहत पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों को घूस देने की साजिश रची थी। इसके बाद ये याचिका दाखिल की गई।

 चूंकि मेडिकल कॉलेज का मामला चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में एक बेंच द्वारा सुना जा रहा था, इसलिए CJAR ने मांग की थी कि इसकी सुनवाई CJI दीपक मिश्रा ना करें बल्कि पांच वरिष्ठ जज सुनवाई करें।   हालांकि इसे अनुमति नहीं दी गई और CJI ने प्रशासनिक और न्यायिक तौर पर याचिका पर निर्णय लिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ये याचिका पूरी तरह तुच्छ, अवमानना वाली और अनुचित है। साथ ही ये देश की उच्चतम न्यायिक प्रणाली को बदनाम करने के लिए दाखिल की गई। कोर्ट ने 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि उस फैसले में रिकार्ड पर कई त्रुटियां हैं, जो न्याय के खिलाफ हैं। CJAR ने कभी भी ये नहीं कहा कि सीबीआई ने किसी वर्तमान जज का नाम लिया है। यह बताता है, "हालांकि, एफआईआर में आरोपों की प्रकृति ऐसी है कि सीबीआई द्वारा किसी ना किसी चरण पर मेडिकल कॉलेज के केस की सुनवाई कर रहे जजों को शामिल किया जाएगा, कम से कम ये सत्यापित करने के लिए कि क्या आरोपी सिर्फ पैसे बनाने के लिए जजों के नाम का इस्तेमाल कर रहे थे ? इसलिए, जब न्यायालय ने ये कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता करने की कोई संभावना नहीं है, तो ये त्रुटि हुई है।”

 याचिका में CJI मिश्रा के सुनवाई से अलग करने के लिए अपनी मांग को समझाते हुए प्रस्तुत करने का प्रयास भी किया गया है, "यह कानून का मूल सिद्धांत है कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि दिखाई भी देना चाहिए ।इसके अलावा न्यायशास्त्र के कानूनी सिद्धांत, नेमो जुडेक्स इस प्रकरण में सुमा की स्थापना इस सिद्धांत पर की जाती है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता।

यह याचिकाकर्ता का मामला नहीं है कि किसी भी मौजूदा जज को प्राथमिकी में नामित किया गया है, जिसने उसे वर्तमान याचिका दायर करने से अयोग्य घोषित किया है।  यह  एक मेडिकल कॉलेज की जांच से संबंधित मामला है और उस जज के सुनवाई से अलग करने का मामला बनाता है जो उस मामले की सुनवाई करने वाली बेंच का हिस्सा था। " याचिका में तर्क दिया गया है कि इसे अवमानना व बदनामी वाली नहीं कहा जा सकता क्योंकि SIT जांच ही “ न्यायपालिका के आधारहीन उत्पीड़न से संरक्षण" सुनिश्चित करेगी।

इसी तरह की एक याचिका को पहले ही खारिज करने और जुर्माना लगाए जाने पर याचिका में कहा गया है कि ये जुर्माना प्राकृतिक न्याय के नियमों और कानून के नियमों का उल्लंघन है।

इसमें कहा गया है, "इसी तरह की याचिका को खारिज के बावजूद याचिकाकर्ता के वकील का  न्यायालय के समक्ष ये प्रस्तुत करने के लिए यह कर्तव्य था कि वह याचिका में मांग की गई राहत के लिए अदालत को राजी कर सके। कोर्ट न्याय के हित में अपने फैसले की समीक्षा करते रहे हैं, इसलिए, वास्तविक विश्वास में याचिकाकर्ता ने इस मामले से इस बात का तर्क दिया कि अगर तथ्यों को ठीक से रखा जाता है तो यह  न्यायालय याचिका पर सुनवाई कर सकता है  और अदालत ने घैर्यपूर्वक सुनवाई भी की है। सुनवाई के किसी भी चरण में याचिकाकर्ता को ये प्रतीत नहीं हुआ कि उस पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा वो भी उन दलीलों के लिए, जिनके देने के लिए वो पूरी तरह हकदार था।”


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