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निर्माण गतिविधियों में पर्यावरण चिंताओं को कमतर करने के कारण एनजीटी ने सरकार की अधिसूचना खारिज की [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
3 Jan 2018 8:00 AM GMT
निर्माण गतिविधियों में पर्यावरण चिंताओं को कमतर करने के कारण एनजीटी ने सरकार की अधिसूचना खारिज की [निर्णय पढ़ें]
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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की मुख्य बेंच ने 9 दिसंबर 2016 को केंद्रीय पर्यावारण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना को खारिज कर दिया। इस अधिसूचना में निर्माण कार्य के लिए जरूरी पर्यावरण क्लीयरेंस को बहुत ही कमजोर कर दिया गया है।

14 सितम्बर 2006 को जारी की गई ईआईए की अधिसूचना के अनुसार अगर कोई निर्माण कार्य 20 हजार वर्ग मीटर या उससे ज्यादा बड़े क्षेत्र में होता है तो इसके लिए पर्यावरण क्लीयरेंस की जरूरत होगी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेनी होगी। पर 9 दिसंबर 2006 को जारी संशोधित ईआईए अधिसूचना में इन प्रावधानों को कमजोर कर दिया गया।

संशोधन के बाद जारी अधिसूचना के प्रावधान इस तरह से हैं :




  • अगर कोई आवासीय भवन डेढ़ लाख वर्ग मीटर क्षेत्र में बनाया जा रहा है तो उसे राज्य प्रदूषण बोर्डों की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी।

  • 20 हजार वर्ग मीटर के बिल्ट-अप क्षेत्र वाले निर्माण कार्य के लिए एसईआईएए से पर्यावरण क्लीयरेंस की जरूरत नहीं होगी। पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए आवेदन पर अनुमति स्थानीय अथॉरिटी/विकास अथॉरिटी देगा।

  • पर्यावरण क्लीयरेंसके लिए आवेदन पर अनुमति अब नव सृजित “पर्यावरण प्रकोष्ठ” देगा।

  • पहले पर्यावरण क्लीयरेंसकी स्थिति रिपोर्ट हर छह माह पर जमा करना पड़ता था; अब इसको बढ़ाकर पांच साल में एक बार कर दिया गया है।

  • पर्यावरण क्लीयरेंसका उल्लंघन करने पर राज्य सरकार के कानूनों के तहत स्थानीय प्राधिकरण दंड सुनाएगा। पहले पर्यावारण संरक्षण अधिनियम की धारा 15 और 19 के तहत यह कारवाई करने का प्रावधान था।


इन संशोधनों को एनजीटी में चुनौती दी गई। प्रतिवादी ने दलील दी कि एनजीटी को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत अधिसूचना की संवैधानिकता को जांचने का अधिकार नहीं है। हालांकि एनजीटी ने इस प्राथमिक आपत्तियों को यह कहकर टाल दिया कि उसे देश में लागू पर्यावरण क़ानून के तहत किसी भी तरह के आधिकारिक आदेशों को जांचने का अधिकार है।

नॉन-रिग्रेशन के सिद्धांत के अनुसार, “पर्यावरण संरक्षण क़ानून का इस तरह संशोधन नहीं होना चाहिए इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचे।” यह पाया गया कि आलोच्य अधिसूचना इस सिद्धांत से भटक गया। इस अधिसूचना ने पर्यावरण आकलन की पूरे ढाँचे को ही कमजोर कर दिया जिसको कि एनजीटी समय समय पर अपने फैसलों से मजबूत करता रहा है।

इस अधिसूचना के द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत केंद्र सरकार और इसके अधीनस्थ अथॉरिटीज के अधिकार ले लिए गए और इसे राज्य सरकारों और उसके संस्थानों को दे दिए गए।

एनजीटी ने यह भी पाया कि यह अधिसूचना बिना किसी उचित अध्ययन और शोध के जारी किया गया। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि इस बीच पर्यावरण की स्थिति में सुधार हो गया जिसकी वजह से यह अधिसूचना लानी पड़ी। फिर अधिसूचना के प्रारूप के कुछ प्रावधानों को अधिसूचना में जगह नहीं मिली।

एनजेटी को पर्यावरण प्रकोष्ठ के गठन और उसके कार्यों में भी विरोधाभास नजर आया। इस प्रकोष्ठ के सदस्यों की योग्यता क्या होगी इस बारे में भी कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

हालांकि, एनजीटी ने कहा कि इस अधिसूचना में कुछ अच्छी बातें भी हैं और यह गरीब लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए निगरानी का विकेंद्रीकरण और एकल खिड़की सेवा शुरू करने की बात करता है। एनजीटी ने कहा कि इस अधिसूचना में जो आपत्तिजनक प्रावधान हैं उसे हटाकर इसे निरस्त कर दिया गया है। मंत्रालय से कहा गया है कि वह इसके प्रावधान को तब तक लागू नहीं करे जब तक कि इसके प्रावधानों की दुबारा जांच पूरी नहीं कर ली जाती।


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