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नए सबूतों के आधार पर NGO ने SC में अस्थाना को CBI का विशेष निदेशक बनाए जाने पर दाखिल की पुनर्विचार याचिका [याचिका पढ़े]

LiveLaw News Network
24 Dec 2017 8:41 AM GMT
नए सबूतों के आधार पर NGO ने SC  में अस्थाना को CBI का विशेष निदेशक बनाए जाने पर दाखिल की पुनर्विचार याचिका [याचिका पढ़े]
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NGO कॉमन कॉज ने गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की सीबीआई के विशेष निदेशक के रूप में नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। इससे पहले  जस्टिस  आरके अग्रवाल और जस्टिस ए एम सपरे की बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया था।

30 अगस्त को सीबीआई की दिल्ली यूनिट ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत तीन वरिष्ठ आयकर अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी  जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से  5,383 करोड़ रुपये की धोखाधडी के मामले में गुजरात की स्टर्लिंग बायोटेक और संदेसारा ग्रुप ऑफ कंपनी से कथित तौर पर रिश्वत लेने का आरोप था।

खारिज याचिका में 2011 के आयकर छापे में एक डायरी की जब्ती के कारण सीबीआई  के विशेष निदेशक के रूप में अस्थाना की नियुक्ति लिए जारी के नियुक्ति समिति के 22 अक्तूबर के आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी। कहा गया कि उक्त कंपनियों के परिसर में मिली इस डायरी में गुजरात और दिल्ली के कई आयकर और पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं को किए जाने वाले भुगतान का ब्योरा भी शामिल है। इसमें प्रतिवादी का भी जिक्र है जो उस वक्त सूरत के  पुलिस आयुक्त थे।

अपने फैसले में बेंच ने कहा था कि चयन समिति, जिसमें मुख्य सतर्कता आयुक्त, सतर्कता आयुक्त, गृह सचिव व सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) शामिल हैं, जिन्होंने सीबीआई के निदेशक के साथ मशवरा करने के बाद ये सिफारिश की थी।6 जुलाई को अस्थाना की नियुक्ति के प्रस्ताव को सीबीआई ने ही भेजा था।

बेंच ने ये भी कहा कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के 21 अक्तूबर  के गोपनीय पत्र में अस्थाना की योग्यता पर संदेह व्यक्त करने वाली एक  टिप्पणी को शामिल किया गया था, जिसे समिति ने उचित रूप से माना था।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति के सर्वसम्मत निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। महेश चंद्र गुप्त बनाम केंद्र सरकार [(200 9) 8 एससीसी 273] का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि यहां तक ​​न्यायिक समीक्षा के दायरे का विस्तार नहीं हुआ है। कोर्ट ने नोट किया था कि एफआईआर में अस्थाना के नाम का उल्लेख नहीं है।

अब इस मामले में  नए सबूतों के सामने आने पर ये पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है।

 याचिकाकर्ता ने कोर्ट में  केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के 9 नवंबर को एक पत्र प्रस्तुत किया था जिसमें सीबीआई निदेशालय द्वारा 21 अक्तूबर को होने वाली चयन समिति की बैठक में सीबीआई निदेशक की एक रिपोर्ट मांगी गई थी।इस पत्र में सीवीसी ने ये भी पूछा था कि क्या सीबीआई निदेशक द्वारा दिए गए नोट में निर्दिष्ट दस्तावेजों पर कोई सत्यापन किया गया है ?

याचिकाकर्ता ने इस पत्र के आधार पर कहा है कि  सरकार के वकील द्वारा प्रस्तुत 21 अक्तूबर की बैठक के मिनट गलत तथ्यों पर आधारित थे ताकि इस दस्तावेज को भ्रामक बताया जा सके कि सीवीसी ने नोट में उल्लिखित दस्तावेजों को सत्यापित किया है और उस पर कुछ नहीं मिला। सीवीसी चयन समिति की सिफारिशों को बिना किसी भी प्रकार की मूलभूत जानकारी और उस नोटिफ़िकेशन के बिना बनाया गया था। “

याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि इस मामले में केंद्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने तथ्यों को छिपाया है और सीवीसी के नौ दिसंबर को सीबीआई को लिखे पत्र की जानकारी छिपाई।

इसके अलावा  याचिकाकर्ता ने ये भी दावा किया है कि इस फैसले में कोर्ट ने ये गौर नहीं किया कि  सीबीआई की संस्थागत अखंडता के मुद्दे के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। एफआईआर में जांच अधिकारी अपने बॉस की भूमिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं कर पाएंगे, जो कि  स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड और संदेसारा ग्रुप

के करीब हैं। इसलिए सीबीआई संस्थागत अखंडता के साथ समझौता करने के लिए बाध्य है।

इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कोर्ट ने  राकेश अस्थाना के बेटे अंकुश अस्थाना स्टर्लिंग बायोटेक में रोजगार और राकेश अस्थाना की बेटी की शादी से पहले संदेसारा के फार्महाउस में पार्टी पर भी कोई फैसला नहीं दिया। ये मुद्दे दागी कंपनियों के साथ अस्थाना की नजदीकी साबित करते हैं।

अंत में यह कहा गया है कि पूर्व के फैसले में इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा गया कि वर्तमान प्रतिवादी ने वर्ष 2016 के लिए डीओपीटी की अधिसूचना के तहत अपनी संपत्ति का रिटर्न  दाखिल नहीं किया है। इसलिए अस्थाना सीबीआई के विशेष निदेशक के रूप में पैनल के लिए योग्य नहीं है।


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