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पति की इच्छा के खिलाफ नौकरी करना क्रूरता नहीं है : इलाहाबाद हाई कोर्ट

LiveLaw News Network
24 Dec 2017 6:34 AM GMT
पति की इच्छा के खिलाफ नौकरी करना क्रूरता नहीं है : इलाहाबाद हाई कोर्ट
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पत्नी का पति या उसके परिवार की इच्छा के खिलाफ नौकरी करना क्रूरता नहीं है और यह तलाक का आधार नहीं हो सकता है।

फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी की क्रूरता और साथ छोड़े जाने के कारण तलाक की अनुमति दे दी थी क्योंकि पत्नी ने पति की इच्छा के खिलाफ नौकरी कर रही थी।

न्यायमूर्ति शबीहुल हसनैन और न्यायमूर्ती शेओ कुमार सिंह ने लार्ड डेनिंग की “क़ानून की उपयुक्त प्रक्रिया” का हवाला देते हुए कहा, “एक महिला एक पुरुष की तरह बहुत गहनता से महसूस करती है बहुत ही स्पष्ट रूप से सोचती है। वह अपने क्षेत्र में उतना ही उपयोगी काम करती है जितना उपयोगी कोई पुरुष करता है। उसको अपना व्यक्तित्व विकसित करने के लिए स्वतंत्रता का उतना ही अधिकार है जितना किसी पुरुष को। जब वह शादी करती है तो वह अपने पति की नौकर नहीं बन जाती है बल्कि उसका बराबर का साझीदार बनती है। अगर पुरुष का काम समुदाय के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है तो स्त्री का काम उसके परिवार के जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। दोनों में से किसी का भी काम दूसरे के बिना नहीं चलता है। कोई भी एक-दूसरे के ऊपर नहीं है और न ही एक-दूसरे के अधीन। वे दोनों ही बराबर हैं।”

कोर्ट ने विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया और कहा : यह आधार कि पत्नी ने नौकरी शुरू की, हमारे विचार में, इसे न तो क्रूरता कहा जा सकता है और न ही यह तलाक का आधार हो सकता है।”

बेंच ने यह भी कहा कि नौकरी करके पत्नी ने पति को छोड़ने का भी काम नहीं किया। इस अपील पर सुनवाई के बाद काफी विस्तृत फैसला दिया गया और कोर्ट ने ‘मानसिक क्रूरता’ का भी इसमें चित्रण किया है।




  • सिर्फ स्नेह में आए ठंडापन या इसका नहीं होना क्रूरता नहीं हो सकती। भाषा की रुखाई, व्यवहार में झल्लाहट, उदासीनता और उपेक्षा इस हद तक बढ़ सकती है कि वह वैवाहिक जीवन को दूभर बना देता है।

  • मानसिक क्रूरता एक दिमागी अवस्था है। किसी एक पार्टनर के व्यवहार की वजह से दूसरे पार्टनर में अगर लंबे समय तक के लिए गुस्सा, निराशा और कुंठा पैदा होती है तो इससे मानसिक क्रूरता पैदा हो सकती है।

  • मात्र तुच्छ चिडचिडाहट, झगड़े और वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य टूट-फूट को इतना पर्यात नहीं होता है और इसे मानसिक क्रूरता बताकर इसको तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

  • वैवाहिक जीवन को उसकी पूर्णता में देखना चाहिए और कुछ सालों में इधर-उधर हुई कुछ अलग-थलग घटनाएं क्रूरता का आधार नहीं बनती। दुर्व्यवहार इतना लंबा हो और संबंध इस हद तक खराब हो गया है कि पार्टनरों में किसी एक के कारण दूसरे पार्टनर को साथ रहना मुश्किल हो गया हो तो यह मानसिक क्रूरता हो सकती है।

  • अगर कोई पति बिना किसी चिकित्सा कारण के नसबंदी का ऑपरेशन कराता है इसके बारे में न तो अपनी पत्नी को बताता है या उसकी अनुमति लेता है और इसी तरह अगर पत्नी भी इसी तरह करती है और एक को दूसरे का यह व्यवहार मानसिक क्रूरता लग सकता है।

  • शारीरिक अक्षमता या उचित कारण के बिना काफी लंबे समय तक शारीरिक संबंध नहीं बनाने का एकपक्षीय निर्णय मानसिक क्रूरता हो सकती है।

  • पति या पत्नी के वैवाहिक जीवन के रहते हुए बच्चे पैदा नहीं करने का एकपक्षीय निर्णय क्रूरता हो सकती है।

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