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सभी उच्च शिक्षा संस्थान दिव्यांगों के लिए कम से कम 5% सीट रिज़र्व करें या फिर कार्रवाई झेलने के लिए तैयार रहें : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
16 Dec 2017 9:29 AM GMT
सभी उच्च शिक्षा संस्थान दिव्यांगों के लिए कम से कम 5% सीट रिज़र्व करें या फिर कार्रवाई झेलने के लिए तैयार रहें : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आदेश दिया कि सभी सरकारी और सरकार की आर्थिक मदद से चलने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों को प्रवेश में हर साल पांच प्रतिशत सीट दिव्यांगों के लिए आरक्षित करनी होगी। ऐसा नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ कारवाई की जाएगी।

न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने आदेश में कहा, “...हमारा आदेश है कि विकलांगता अधिनियम 2016 की धारा 32 के तहत ऐसे सभी उच्च शिक्षा संस्थान जो इसके अधीन आते हैं, प्रवेश प्रक्रिया में धारा 32 के प्रावधानों को लागू करेंगे।

“इसके तहत उन्हें हर साल हर कोर्स में कितने दिव्यांगों को प्रवेश दिया गया उसकी सूची मुख्य आयुक्त और/या राज्य आयुक्त (जो भी जरूरी होगा) को भेजनी होगी। मुख्य आयुक्त/राज्य आयुक्त यह देखेगा कि इन शिक्षा संस्थानों ने अपने कर्तव्यों को पूरा किया है या नहीं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि विकलांगता अधिनियम 2016 की धारा 89 एवं अन्य प्रावधानों के तहत अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश डिसेबल्ड राइट्स ग्रुप एंड अदर्स बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में 11 साल पुरानी याचिका पर दिया है। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि उच्च शिक्षा संस्थानों में तीन प्रतिशत सीटों के आरक्षण से संबंधित फैसले (डिसेबिलिटी एक्ट 1995 की धारा 39 और डिसेबिलिटीज एक्ट 2016 की धारा 32 के तहत) को लागू नहीं किया गया है। इसी से जुड़ा यह मामला ओर्थोपेडीक डिसेबल्ड का भी है जिन्हें ऐसी सुविधा उपलब्ध कराने की बात है ताकि वे शिक्षा संस्थानों में आसानी से घूम फिर सकें और अपने संस्थानों की सुविधाओं का लाभ उठा सकें, छात्रों की विकलांगता की प्रकृति को देखते हुए उनके लिए व उनको पढ़ाने में मदद के लिए पर्याप्त उचित प्रबंध करना ताकि वे प्रभावी ढंग से अपना अध्ययन कर सकें। हालांकि पहले याचिका सिर्फ लॉ कॉलेजों को ध्यान में रखकर ही दायर की गई थी पर कोर्ट ने इसे सभी शिक्षा संस्थानों पर लागू होने वाला माना।

बेंच ने यह भी कहा कि शिक्षा संस्थानों को दिव्यांगों की जरूरतों के अनुरूप अपनी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करनी चाहिए।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुझावों की तारीफ़ की। इन सुझावों में इन लोगों के लिए विशेष क्लासरूम, खेल की सुविधा, लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, पढ़ाने के तरीकों, मनोरंजन के साधन आदि उपलब्ध कराए जाने की बात की गई है।

कोर्ट ने उपरोक्त निर्देश के अलावा कहा कि जहाँ तक लॉ कॉलेजों की बात है, ये संस्थान बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) को भी इन बातों की जानकारी देंगे।

अन्य संस्थान इन आदेशों के पालन करने के बारे में हर साल यूजीसी को सूचित करेंगे। यह बीसीआई/और या यूजीसी पर निर्भर करेगा कि वे इस तरह के संस्थान द्वारा किए गए दावे की जांच करते हैं या नहीं।

 जहाँ तक विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में दिव्यांग छात्रों की विभिन्न सुविधाओं के उपयोग में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के बारे में दिशानिर्देश के रूप में दिए गए सुझाव की बात है, तो यूजीसी इसके बारे में एक कमिटी के गठन की उपयोगिता पर गौर करेगा। यूजीसी इस कमिटी में डिसेबिलिटी अधिनियम के तहत नियुक्त केंद्रीय परामर्श बोर्ड, राज्य परामर्श बोर्ड, राज्य के आयुक्तों में से किस मुख्य आयुक्त को शामिल करता है यह उसी पर निर्भर करेगा। यह समिति दिव्यांगों की शिक्षा और शिक्षा प्राप्त करने के लिए जरूरी सुविधाओं की जरूरतों का विस्तृत अध्ययन करेगा और इनसे निपटने और इनके लिए संसाधन जुटाने का उचित सुझाव देगा। इन सुझावों को कब तक लागू किया जाना है इस बात निर्धारण भी वह करेगा। यह विशेषज्ञ समिति हर शिक्षा संस्थानों में एक इन-हाउस निकाय (छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों और अभिभावकों की) के गठन की संभावना पर भी गौर करेगा। यह निकाय दिव्यांगों की दैनिक जरूरतों का ख़याल रखेगा और यह देखेगा कि उनके लिए जो स्कीम्स चलाए गए हैं उनको लागू किया जा रहा है या नहीं। यह सारा कार्य 30 जून 2018 तक पूरा हो जाना चाहिए।

इस बारे में और इस पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट जुलाई 2018 में कोर्ट के समक्ष पेश की जाएगी।

कोर्ट ने कहा, “यह बताने की जरूरत नहीं है कि डिसेबिलिटी अधिनियम इस मौलिक विचार पर आधारित है कि समाज दिव्यांगों के लिए बाधाएं और उत्पीड़नकारी संरचनाएं खड़ी करता है जो उनकी क्षमताओं को सीमित करता है। मार्था नुसबौम जैसी सिद्धांतकारों का मानना है कि दिव्यांगों के लिए अलग तरह की क्षमताओं और अलग सामर्थ्यों की सीमा नहीं हो सकती। यह सभी नागरिकों के लिए प्रतिस्पर्धा और अवसरों के लिए समान स्तर की तलाश का मुद्दा उठाता है ताकि देश के सभी लोगों को अपनी प्रतिभा को निखारने का समान अवसर मिले।”

सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगता के सामाजिक मॉडल पर टिपण्णी की जिसमें कहा गया है कि कृत्रिम व्यवहार, संगठनात्मक और माहौल संबंधी बाधाएं खड़ी कर सामाजिक रूप से विकलांगता को गढ़ा जाता है।

बेंच ने जॉन नैश और स्टीफन हॉकिंस का उदाहरण दिया। बेंच ने कहा, “विकलांगता तभी सामने आती है जब वह किसी व्यक्ति को वह नहीं करने देता जो वह करना चाहता है। व्हीलचेयर में बैठा एक वकील उतना ही प्रभावकारी होगा बशर्ते कि वह कोर्टरूम में आ सके और क़ानून की लाइब्रेरी तक उसकी पहुँच हो और उसे वह सारी सुविधाएं मिले जो उसको अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए जरूरी है। एक व्यक्ति जो सुन नहीं सकता, हो सकता है कि वह एक बेहद अच्छा कारपेंटर सिद्ध हो या वह केमिस्ट्री लैब का प्रमुख हो सकता है बशर्ते वह वह अपने सहयोगियों से संवाद कर पाए। मानसिक बीमारियों से ग्रस्त एक व्यक्ति हो सकता है कि एक बेहद प्रतिभाशाली विद्वान हो या सिद्धांतकार बने।”

बेंच ने विशेष जरूरतों वाले व्यक्तियों की उच्च शिक्षा की जरूरतों (एचईपीएसएन) का जिक्र किया और कहा कि इसकी तीन योजनाएं हैं जिसमें दिव्यांगों के लिए एनेबलिंग यूनिट्स तैयार करना, शिक्षा संस्थानों की विभिन्न सुविधाओं तक उनकी पहुँच को आसान बनाना (और इसके लिए यूजीसी प्रत्येक कॉलेज को योजना अवधि के लिए पांच लाख रुपए दने पर सहमत हो गया है) और तीसरा है दिव्यांगों के लिए शिक्षा सेवाओं को बढाने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता।


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