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CJI मिश्रा का पद्मावती फैसले में 148 शब्दों का वाक्य

LiveLaw News Network
2 Dec 2017 5:11 AM GMT
CJI मिश्रा का पद्मावती फैसले में 148 शब्दों का वाक्य
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने एक बार फिर ये कर दिया।

शेक्सपियर की बोली और प्राचीन ग्रंथों/ साहित्य से शब्दों को लेकर अपने फैसले/ आदेश में शब्दों का खेल खेलने के तौर पर जाने जाने वाले जज ने तीन दिन पहले अपने फैसले में 148 शब्दों का वाक्य लिखा है।

2015 के एक फैसले में जस्टिस मिश्रा ने 192 शब्दों का वाक्य लिखा था।

एम एल शर्मा बनाम संजय लीला भंसाली मामले में 28 नवंबर को दिए आदेश में पहले पैरा में 148 शब्दों का वाक्य लिखा गया है।

इस आदेश में वकील मनोहर लाल शर्मा की उस याचिका को खारिज किया गया जिसमें निर्देशक संजय लीला भंसाली को उनकी विवादित फिल्म को विदेशों में रिलीज करने से रोकने की मांग की गई थी।

जस्टिस मिश्रा के दूसरे वाक्यों की तरह इसमें कठिन शब्दों या साहित्य का इस्तेमाल नहीं किया गया और ये आसान लिखे गए हैं।

ये है वाक्य

“ वर्तमान रिट याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका के तौर पर परिभाषित करते हुए मूलत: दो प्रार्थनाओं के साथ दी गई कि एक फिल्म ‘ पद्मावती ‘ को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन ( CBFC) से सिनेमेटोग्राफी एक्ट, 1952 ( संक्षेप में, एक्ट) के तहत नियमों व गाइडलाइन के अंतर्गत  सर्टिफिकेट जारी किए बिना दूसरे देशों में प्रदर्शित ना की जाए और आगे परमादेश की रिट जारी कर केंद्रीय जांच ब्यूरो ( CBI), प्रतिवादी संख्या 5 को प्रतिवादी संख्या 1 और 2 और उनके टीम सदस्यों के खिलाफ एक्ट की धारा 7 के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 153A, 295, 295A, 499 और 500 के साथ इंडिसेंट रिप्रिजेंटेशन ऑफ वुमन ( प्रोहिबिशन) एक्ट, 1986 के तहत FIR दर्ज करने और जांच करने तथा कानून के मुताबिक उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दाखिल की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस मिश्रा ने 2015 में दिए एक फैसले में 192 शब्दों का पैरा लिखा था। ( प्रियंका श्रीवास्तव व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य -2015)

 जज ये कहना चाहते थे कि केस तुच्छ था जिसे सिर्फ विरोधी पार्टी को सिर्फ परेशान करने और उसे कोर्ट के बाहर समझौते के लिए तैयार करने के लिए दबाव बनाने के लिए दाखिल किया गया। ये वाक्य कुछ इस तरह है :

“ वर्तमान अपील दर्शाती है और भित्तिचित्र की तस्वीर दिखाती है जो ना केवल परेशान करने वाली है बल्कि उसमें हलचल पैदा करने और व्याकुल करने की संभावना है कि कैसे कुछ बेशर्म, गैरसैद्धांतिक और विकृत मुकदमेबाज चतुराईपूर्वक अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए बेपरवाह नए तरीके आजमाते हैं जैसे ये कोई प्रयोगशाला हो जहां विविध प्रकार के प्रयोग किए जा सकते हों और  ऐसे कुशल लोग कैनवस को व्यथा की पेंटिंग से मर्जी और मुस्तैदी से  याचिका में दावे करके अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सकते हैं और वास्तव में उनका इरादा वैधानिक अथॉरिटी को परेशान करने, बिना किसी गहरे पश्चाताप, प्राथमिक तौर पर उन अफसरों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए, आपराधिक केसों में वो कोर्ट में ना घसीटने के लिए और आगे वित्तीय संस्थान जिसका वो प्रतिनिधित्व करते हैं उन पर इस तरीके से दबाव बनाने कि वो एक बार में समझौते के आग्रह को मंजूर करने के लिए आखिरकार खुद को रोक लें इस उम्मीद में कि वो डिफाल्टर जिन्होंने संस्थान से पैसा उधार लिया है, उनके खिलाफ केसों को वापस ले लें।

जस्टिस मिश्रा के शब्दों के खेल के कुछ उदाहरण

24 जुलाई 2003  को श्याम नारायण चोकसे बनाम केंद्र सरकार व अन्य ( मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में राष्ट्रगान मामला )

“ राष्ट्रगान को magna cum laude यानी बडे सम्मान के साथ गाया जाना चाहिए और कोई भी summa cum laude यानी सराहना की तीन डिग्री के सिद्धांत से बाहर नहीं जा सकता। वर्तमान केस में  हमने गौर किया है कि  पहले मुख्य पात्र का बेटा  सरपराइज आयटम के तौर पर राष्ट्रगान गाता है। हमारे हिसाब से ये पेशकश बीच में की जाती है। बाल कलाकार पंक्ति भूल जाता है और सॉरी शब्द बोलता है। कुछ की नजर में ये जबान की चूक, जबान फिसलना या प्राकृतिक भूल जाना है लेकिन सारी बातों  पर गौर करें, समझें और मूल्यांकन करें तो पूरी तस्वीर सामने आती है कि ये कहानीकार की  कोरी कल्पना और निर्देशक  का  आइडिया है। “

अन्य पैरा -  “ राष्ट्रगान भारत की संप्रभूता और अखंडता के मूल सिद्धांत का आधार और केंद्रिमुख है। ये राष्ट्रीयता की मज्जा, देशभक्ति का सार, राष्ट्रीय धरोहर  का केंद्रक, संस्कृति की बुनियाद और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। “

वोल्यूटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ पंजाब बनाम पंजाब राज्य ( कन्या भ्रूण को लेकर जागरूकता फैलाने की अहमियत )

“ उन्हें ये समझना चाहिए और स्वीकार करना चाहिए कि ये एक  आर्ट और विज्ञान है  और ये आसान  अंकगणित नहीं है। इसे सामान्य भाषण का रंग नहीं दिया जा सकता। जागरूकता शिविरों को इयूक्लिडियन जियोमेट्री के सिद्धांत पर नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए सामाजिक चेतना के सिद्धांत के साथ  विशलेषणात्मक दिमाग और समाज की मज्जा में प्रकाशित करना होगा। अगर जागरुकता शिविर समुचित रुप से नहीं लगाए गए तो लोगों के लिए जरूरी दिशा निर्देश बिना मायने के होंगे और चीजें पर्याप्त नहीं होंगी तथा सभी को निंदक पलायनवाद की शरण लेने की कोशिश करनी होगी। “

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