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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से पूछा, क्या चुनाव आयोग को पार्टी की मान्यता वापस लेने का अधिकार दिया जाए ?

LiveLaw News Network
1 Dec 2017 11:34 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से पूछा, क्या चुनाव आयोग को पार्टी की मान्यता वापस लेने का अधिकार दिया जाए ?
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एक अहम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ये विचार करने के लिए तैयार हो गया है कि चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक पार्टी की मान्यता वापस लेने का अधिकार दिया जाए या नहीं। अभी तक चुनाव आयोग के पास पार्टी को मान्यता देने का ही अधिकार है।

शुक्रवार को  सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच ने इस संबंध में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय की उस मांग पर विचार करने से इंकार कर दिया जिसमें दोषी करार और अयोग्य करार लोगों को राजनीतिक पार्टी बनाने या पार्टी का पदाधिकारी बनाने पर रोक लगाने की मांग की गई थी।चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट कानून नहीं बना सकता।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 के प्रावधान 29 A के तहत चुनाव आयोग किसी राजनीतिक पार्टी को मान्यता देता है लेकिर मान्यता को वापस लेने का अधिकार उसके पास नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को इस कानून में संशोधन करने के आदेश देने चाहिएं।

दरअसल अश्विनी उपाधयाय ने जनहित याचिका दाखिल कर मांग की है कि दोषी नेताओं द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाने पर रोक लगाई जाए जब तक चुनाव आयोग द्वारा वो अयोग्य करार दिया जाता है। याचिका में ये भी कह गया है कि जबतक वो अयोग्य रहता है तब तक वो किसी भी राजनीतिक पार्टी में किसी भी पद पर न रहे।

दरअसल प्रावधान ये कहता है कि जब अदालत द्वारा किसी नेता को आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जाता है और उसे 2 साल से ज्यादा की सजा दी जाती है तो सजा की अवधि पूरी होने के बाद 6 साल तक वो चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाता है।

याचिका में लालू प्रसाद यादव, ओमप्रकाश चौटाला, मधू कोडा व गोपाल कांडा आदि के उदाहरण दिए गए हैं और मांग की गई है कि जब तक वो चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दिया जाता है तब तक वो किसी भी राजनीतिक पार्टी बनाने या किसी पार्टी के पद पर बने रहने के लिए अयोग्य करार दिया जाए।

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